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क्या मुहर्रम को बदनाम करने की रची गई है साजिश ?

जौनपुर। मीरगंज थाना क्षेत्र के गोधना बाजार में मुहर्रम के जुलूस में 29 जुलाई को हिंदुस्तान मुर्दाबाद और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाकर ग़म के महीने को बदनाम करने की साजिश रची गई है। सोमवार की देर रात सोशल मीडिया पर उपद्रवियों द्वारा एक वीडियो डालकर मुहर्रम को बदनाम करने की नीयत से इस कारनामे को अंजाम दिया गया है। बताते चलें कि शिया समुदाय के लोग मुहर्रम में दो महीने 8 दिन लाल, पीले और गुलाबी वस्त्र धारण नहीं करते हैं और न ही कोई खुशी का काम करते है। मुहर्रम में शादी भी नही करते। मुहर्रम को शिया/ सुन्नी दोनों मनाते हैं लेकिन कुछ कट्टरवादी मुस्लिम मुहर्रम और मातम से पहरेज करते हैं। अक्सर इस तरह के कट्टरवादी लोगों को मुहर्रम में ग़म मनाने के खिलाफ़ लिखते हुए देखा जाता है। शिया समुदाय के लोगों का कहना है कि ऐसे शरारती तत्वों का मक़सद मुहर्रम को बदनाम करना है जिससे मुहर्रम जुलूस पर पाबंदी लग जाए। इस घटना से शिया समुदाय के लोगों में आक्रोश व्याप्त है। इस जुलूस में शिया मुस्लिम नही थे। फिलहाल इस शर्मनाक हरकत को अंजाम देने वाले एक दर्जन से अधिक आरोपियों को हिरासत में लिया गया।

सदियों पुराना है विवाद
जौनपुर। मुहर्रम गम का महीना होता है। इसे मुस्लिम अपने अपने हिसाब से मनाते हैं। मुसलमान कई भागों में बटा हुआ है जैसे (शिया, सुन्नी, देवबंदी, बरेलवी, अहले हदीस, हनफी, बोहरा)। शिया समुदाय के लोग मातम करके इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं जबकि मुस्लिमों के अन्य फिर के मोहर्रम के दिनों में लाठी-डंडे और अन्य तरीकों से मोहर्रम मनाते हैं। मुस्लिमों में ही कई ऐसे लोग हैं जो मुहर्रम में नोहा और मातम को गलत मानते हैं। इसी को लेकर कई बार विवाद होता रहता है। अभी हाल ही में वाराणसी में ताजिया दफन करने को लेकर शिया और सुन्नी आमने-सामने हो गए थे और जमकर पथराव हुआ था। मुसलमानो में एक तबका ऐसा है जिन्हें मोहर्रम के जुलूस और मातम से काफी एतराज रहता है।

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Author: fastblitz24

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