बरेली: बदलते मौसम का असर इंसानों के साथ-साथ बेजुबान पशुओं पर भी पड़ता है। खासकर गर्मी और बरसात के मौसम में चारे की किल्लत पशुपालकों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। इस समस्या से निपटने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, बरेली के वैज्ञानिकों ने पशुपालकों को अभी से तैयारी करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि अगर मार्च के महीने में तीन तरह के चारे की बुवाई कर दी जाए, तो मई में इसे काटकर पशुओं को खिलाया जा सकता है। इससे गर्मी के मौसम में चारे की कमी नहीं होगी और दुधारू पशुओं को जरूरी पोषण भी मिलेगा।
गर्मी के मौसम में हरा चारा आसानी से नहीं मिल पाता, जिससे पशुओं में मिनरल्स की कमी हो जाती है। इसका सीधा असर दूध के उत्पादन पर पड़ता है। अक्सर देखा जाता है कि गर्मी में दूध सर्दियों के मुकाबले पतला हो जाता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह का कहना है कि बरसीम, जई और रिजका जैसे हरे चारे की बुवाई अगर मार्च में कर दी जाए, तो यह ढाई महीने में तैयार हो जाता है। मई-जून में इसे काटकर पशुओं को खिलाया जा सकता है। यह चारा पौष्टिक होता है और पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। इसके अलावा ज्वार, बाजरा, लोबिया और मक्का की बुवाई भी मार्च में करने से मई तक अच्छी फसल मिल सकती है। इससे पशुओं को चारा मिलेगा और किसान इसे बेचकर अच्छा मुनाफा भी कमा सकते हैं।

डॉ. रणवीर सिंह के अनुसार, सिलेज बनाकर पशुपालक गर्मी के दौरान हरे चारे की कमी को दूर कर सकते हैं। सिलेज बनाने के लिए पतले तने वाली फसल को पकने से पहले ही काट लेना चाहिए। फिर इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर सुखाना जरूरी है, जब तक उसमें 15 से 18 प्रतिशत तक नमी न रह जाए। अच्छी तरह से सूखने के बाद इसे पैक करके रखना चाहिए ताकि हवा न लगने पाए। अगर चारे को सही से पैक नहीं किया गया, तो यह खराब हो सकता है, जिससे पशुपालकों को नुकसान झेलना पड़ता है।
वैज्ञानिकों की सलाह मानकर पशुपालक गर्मी में हरे चारे की कमी से बच सकते हैं और अपने पशुओं को सेहतमंद रख सकते हैं।

Author: fastblitz24



