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प्रतीक के बाद… अपर्णा का ‘अज्ञातवास’ या नई शुरुआत?

मेनका की त्रासदी और अपर्णा का भविष्य: सत्ता की दहलीज पर खड़ी ‘दोयम दर्जे’ की बहुएं

      भारतीय राजनीति के दो सबसे शक्तिशाली घरानों—गांधी और यादव परिवार—की गाथाओं में एक अजीब और डरावनी समानता उभर कर सामने आई है। यह कहानी है उन बहुओं की, जिन्होंने सत्ता के केंद्र में प्रवेश तो किया, लेकिन विरासत की जंग में उन्हें ‘बाहरी’ घोषित कर दिया गया। आज प्रतीक यादव के निधन ने अपर्णा यादव को ठीक उसी मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ 1980 में संजय गांधी की मौत के बाद मेनका गांधी खड़ी थीं।

1. मेनका गांधी: सफदरजंग से सुल्तानपुर तक का ‘अज्ञातवास’

​1974 में जब एक मॉडल मेनका आनंद का विवाह देश के सबसे शक्तिशाली परिवार के ‘उत्तराधिकारी’ संजय गांधी से हुआ, तो लगा कि वह भविष्य की महारानी हैं। लेकिन 1980 में संजय की मौत ने सब बदल दिया। इंदिरा गांधी के घर में मेनका की ‘छीछालेदर’ शुरू हुई। आरोप, प्रत्यारोप और पारिवारिक अंतर्विरोधों के बीच उन्हें आधी रात को घर से बाहर निकाल दिया गया।

​मेनका ने ‘संजय विचार मंच’ बनाया, संघर्ष किया, लेकिन नियति देखिए—जिस भाजपा ने उन्हें सहारा दिया, उसने उन्हें ‘गांधी’ सरनेम की वजह से कभी मुख्यधारा (Core Decision Making) में नहीं आने दिया। वह सांसद रहीं, अदना मंत्रालयों की मंत्री रहीं, लेकिन भाजपा के भीतर हमेशा ‘पराया’ ही समझी गईं। आज वह राजनीति के उस हाशिए पर हैं जहाँ न सत्ता का रसूख है, न परिवार का साथ।

2. अपर्णा यादव: ‘सैफई’ की दहलीज से भाजपा के सन्नाटे तक

​अपर्णा यादव का ग्राफ भी मेनका से अलग नहीं है। मुलायम सिंह यादव के परिवार की बहू बनीं, प्रतीक यादव जैसे शांत और जिम-फार्महाउस तक सीमित रहने वाले व्यक्ति से विवाह किया, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उन्हें परिवार से बगावत करने पर मजबूर कर दिया।

  • राजनीतिक विरासत से बेदखली: जिस तरह इंदिरा की विरासत राजीव को मिली, मुलायम की विरासत पूरी तरह अखिलेश के नाम रही। प्रतीक यादव को इटावा और मैनपुरी की राजनीतिक जमीन से दूर रखा गया—वह सिर्फ बाराबंकी के फार्महाउस और लखनऊ के जिम तक सिमट कर रह गए।
  • भाजपा की ‘ट्रॉफी’: अपर्णा ने भाजपा का दामन थामते समय अखिलेश के जीवन में ‘कांटे’ बोने की पूरी कोशिश की, लेकिन परिणाम शून्य रहा। भाजपा ने उन्हें एक ‘यादव बहू’ के लेवल के साथ अपनाया तो सही, लेकिन उन्हें कोई ठोस राजनीतिक मंच नहीं दिया।

3. प्रतीक की मौत और ‘सोशल मीडिया’ का सन्नाटा

​प्रतीक यादव की 38 वर्ष की आयु में हुई मौत के बाद जो चुप्पी है, वह डरावनी है। उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार की बहू होने के बावजूद, अपर्णा को न तो वह राजनीतिक संवेदना मिल रही है जो ऐसे समय में अपेक्षित होती है, और न ही उनकी अपनी पार्टी (भाजपा) उनके पीछे मजबूती से खड़ी दिख रही है।

​सोशल मीडिया पर पसरा यह सन्नाटा बताता है कि राजनीति कितनी निर्दयी है। जब तक आप ‘उपयोगी’ हैं, आप चर्चा में हैं; जैसे ही आपके पीछे का ‘पावर स्ट्रक्चर’ (प्रतीक का साथ) खत्म हुआ, आप अकेले छोड़ दिए जाते हैं।

4. ससुर का ‘प्रॉपर्टी डीलर’ अवतार और पारिवारिक कलह

​प्रतीक यादव के अंतिम वर्ष किसी त्रासदी से कम नहीं थे। जहाँ एक ओर अखिलेश का वर्चस्व था, वहीं दूसरी ओर प्रतीक अपने ससुराल पक्ष के लालच और अपनी माँ (साधना गुप्ता) की हरकतों से हुई ‘छीछालेदर’ के बीच घुनने लगे थे। ससुर की छवि एक पत्रकार के बजाय ‘प्रॉपर्टी डीलर’ की तरह उभरी, जिसने रिश्तों की मर्यादा को बाजार में नीलाम कर दिया। प्रतीक इसी कड़वाहट और एकांतवास में सिमटते चले गए।

निष्कर्ष: ‘अकेली’ अपर्णा और इतिहास की गवाही

​आज अपर्णा यादव उसी ‘अज्ञातवास’ की दहलीज पर हैं जहाँ मेनका गांधी ने दशकों बिताए। भाजपा में उन पर ‘मुलायम परिवार’ का ठप्पा लगा है, इसलिए पार्टी उन पर पूरी तरह भरोसा नहीं करती। वहीं, परिवार उन्हें गद्दार मानता है।

​अखिलेश यादव का अस्पताल जाना एक रस्म अदायगी हो सकती है, लेकिन अपर्णा के लिए यह भविष्य के धुंधलके की शुरुआत है। राजनीति की यह ‘नई मेनका गांधी’ अब शायद यह समझ पाएगी कि जब आप अपनी जड़ें काटकर दूसरे के बाग में फलने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर आप सिर्फ एक ‘सजावटी पौधा’ बनकर रह जाते हैं।

​अपर्णा का भविष्य अब उसी ‘धूम्र नृत्य’ (अफवाहों के खेल) का हिस्सा होगा, जहाँ उम्मीदें आसमान छूती हैं लेकिन हासिल हमेशा ‘शून्य’ ही रहता है।

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Author: fastblitz24

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