संसद में सरकार का बड़ा खुलासा
1.41 लाख सैंपलों की जांच में 3,000 से अधिक दवाएं NSQ (मानक से नीचे) और 283 पाई गईं पूरी तरह नकली।
-
कानूनी ढिलाई पर सवाल
काउंटरफीट’ की कोई ठोस परिभाषा नहीं, न बाज़ार के आकार का अंदाज़ा; फिर कैसे रुकेंगे मौत के ये सौदागर?

नई दिल्ली।
क्या आप जो दवा अपने या अपने परिजनों के इलाज के लिए मेडिकल स्टोर से खरीद रहे हैं, वह सचमुच जीवनदायिनी है या धीमी मौत का सामान? राज्यसभा में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए खौफनाक आंकड़े तो कम से कम यही इशारा कर रहे हैं। देश में दवाओं के सैंपल फेल होने और नकली दवाओं के कारोबार का मकड़जाल इस कदर फैल चुका है कि हर साल 3,000 से अधिक दवाओं के सैंपल प्रयोगशालाओं की जांच में घटिया (Not of Standard Quality – NSQ) पाए जा रहे हैं।
संसद के पटल पर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल द्वारा दिए गए जवाब ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 1.41 लाख दवाओं के सैंपलों की जांच की गई, जिनमें से 3,012 सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। यानी ये दवाएं मानक गुणवत्ता में पूरी तरह से फेल रहीं। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि 283 सैंपल पूरी तरह से ‘स्प्यूरियस’ यानी ‘नकली/मिलावटी’ पाए गए!
पिछले 5 सालों की भयावह तस्वीर: आंकड़ों की ज़ुबानी
अगर आपको लगता है कि यह महज़ एक साल की चूक है, तो पिछले पांच सालों के आंकड़े आपकी नींद उड़ाने के लिए काफी हैं। हर साल औसतन 3,000 घटिया और सैकड़ों नकली दवाओं का जखीरा बाज़ार में उतर रहा है:
|
साल |
कुल टेस्ट हुए सैंपल |
घटिया दवाएं (NSQ) |
नकली/स्प्यूरियस दवाएं |
दर्ज मामले (Prosecution) |
|---|---|---|---|---|
|
2025-26 |
1,41,000 |
3,012 |
283 |
779 |
|
2024-25 |
1,16,323 |
3,104 |
245 |
961 |
|
2023-24 |
1,06,150 |
2,988 |
282 |
604 |
|
2022-23 |
96,713 |
3,053 |
424 |
663 |
|
2021-22 |
88,844 |
2,545 |

टेस्टिंग बढ़ी तो खुला काला सच: NSQ और Spurious में समझें अंतर
सरकारी तंत्र का तर्क है कि 2021-22 में जहां महज 88 हजार सैंपल जांचे जाते थे, वहीं अब 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 1.41 लाख हो गई है। टेस्टिंग का दायरा बढ़ने से गड़बड़ी ज़्यादा पकड़ में आ रही है। लेकिन सवाल यह है कि जो दवाएं जांच से बच निकलती हैं, उनका शिकार कौन बन रहा है? आम नागरिक!
आम जनता को दो मुख्य श्रेणियों का अंतर समझना बेहद ज़रूरी है:
- NSQ (मानक गुणवत्ता के विपरीत): इसका सीधा मतलब है कि दवा तो असली कंपनी की है, लेकिन उसमें सॉल्ट की मात्रा कम या ज़्यादा है, या वह शरीर में सही से घुल नहीं पा रही। यह मरीज के इलाज को बेकार बना देती है।
- Spurious (नकली/मिलावटी): यह सीधे तौर पर चॉक, आटा या हानिकारक रसायनों से बनाई गई पूरी तरह से फर्जी दवा है, जो शरीर के लिवर और किडनी को सीधा निशाना बनाती है।
’कागजी कानूनी दांवपेंच’ और व्यवस्था की ढिलाई पर उठे सवाल!
संसद में जब सरकार से इस गैर-कानूनी कारोबार के बाज़ार आकार (Market Size) पर सवाल पूछा गया, तो जवाब मिला कि “नकली दवाओं के बाज़ार के आकार का आकलन करने के लिए कोई विशिष्ट अध्ययन नहीं किया गया है।”
इतना ही नहीं, सरकार ने यह भी साफ किया कि हमारे Drugs and Cosmetics Act, 1940 में ‘Counterfeit’ (काउंटरफीट) शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा ही दर्ज नहीं है, हालांकि इसे Spurious और Misbranded की श्रेणियों में ढका जाता है।
Fast blirz 24 का सीधा सवाल:
जब देश की दवा नियामक संस्था CDSCO “एक ब्रांड = एक फॉर्मूलेशन” और एडवर्स ड्रग रिएक्शन (ADR) लेबलिंग जैसे कड़े नियमों का ढिंढोरा पीट रही है, तब भी हर साल बाज़ार में हजारों घटिया और सैकड़ों नकली दवाएं कैसे पहुंच रही हैं? 779 अभियोग (Prosecution) केस दर्ज कर देना ही काफी है या इन ‘मौत के सौदागरों’ को जेल की सलाखों के पीछे डालकर इस नेटवर्क को जड़ से उखाड़ना सरकार की प्राथमिकता है?
लाखों मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे इस पूरे नेक्सस पर अब कठोर कार्रवाई का वक्त आ चुका है, वरना मेडिकल स्टोर से खरीदी गई हर गोली एक नया खतरा बनी रहेगी!




