ईशापुर के राहुल कनौजिया का आरोप- 3 लाख में से 2.10 लाख चुकाने के बाद भी भंडारी पुलिस बना रही है दबाव, निष्पक्ष जांच की मांग
जौनपुर। नगर क्षेत्र में कर्ज के लेन-देन से जुड़े एक मामले में स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। ईशापुर निवासी एक युवक ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि एक निजी उधारी के मामले को लेकर पुलिस के माध्यम से उस पर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है और उसे अनावश्यक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

भाई की शादी के लिए लिया था कर्ज
पीड़ित राहुल कनौजिया (पुत्र प्रेमचंद्र कनौजिया), निवासी ईशापुर, ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि लगभग दो वर्ष पूर्व उसने अपने भाई के विवाह के लिए लाइन बाजार थाना क्षेत्र के खलसहा गांव निवासी संदीप कुमार यादव से 3 लाख रुपये उधार लिए थे। राहुल का दावा है कि वह अपनी ईमानदारी का परिचय देते हुए अब तक कुल 2 लाख 10 हजार रुपये की मोटी रकम संदीप को चुका चुका है। अब केवल 90 हजार रुपये की राशि ही शेष बची है, जिसे वह किस्तों (Installments) में चुकाने के लिए पूरी तरह तैयार है।


चौकी पर बिठाने का आरोप, मानसिक रूप से परेशान
राहुल कनौजिया का आरोप है कि बकाया राशि को लेकर विपक्षी पक्ष ने नगर कोतवाली क्षेत्र की भंडारी पुलिस चौकी में शिकायत की थी। इस शिकायत के बाद से भंडारी पुलिस चौकी द्वारा उसे बार-बार चौकी पर बुलाया जा रहा है और जल्द से जल्द भुगतान करने के लिए अनुचित दबाव बनाया जा रहा है। राहुल ने बताया कि 3 जून 2026 को भी उसे कई घंटों तक चौकी पर बैठाकर रखा गया, जिससे वह मानसिक रूप से बेहद परेशान और डरा हुआ है।
कानूनी पहलू: पुलिस को वसूली एजेंट बनने का अधिकार नहीं, यह विशुद्ध रूप से सिविल मामला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूरा मामला विशुद्ध रूप से एक दीवानी (Civil Dispute) प्रकृति का है। देश के कानून के मुताबिक, किसी भी निजी उधारी या पैसे के लेन-देन के विवाद में पुलिस को सीधे हस्तक्षेप करने या किसी व्यक्ति पर पैसे लौटाने का दबाव बनाने का कोई अधिकार नहीं है।
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- रिकवरी के लिए सिविल कोर्ट का रास्ता: कानूनन, यदि संदीप कुमार यादव को अपनी शेष राशि (90 हजार रुपये) वापस चाहिए, तो उन्हें सक्षम न्यायालय (Civil Court) में ‘मनी रिकवरी सूट’ (पैसे की वसूली का वाद) दायर करना चाहिए।
- पुलिस की सीमाएं: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने भी कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि पुलिस किसी भी दीवानी मामले में ‘रिकवरी एजेंट’ की भूमिका नहीं निभा सकती। किसी नागरिक को बिना किसी आपराधिक मामले (Criminal Case) या बिना किसी ठोस एफआईआर (FIR) के थाने या चौकी में घंटों बिठाकर रखना पूरी तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन और अवैध हिरासत (Illegal Detention) की श्रेणी में आता है। यदि युवक को डराया-धमकाया गया है, तो यह पुलिसिया शक्तियों के दुरुपयोग का गंभीर मामला बनता है।
क्या कहते हैं स्थानीय लोग?
मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्ध वर्ग में रोष है। लोगों का स्पष्ट कहना है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा ऋण भुगतान से इंकार किया जाता है या कोई वित्तीय विवाद उत्पन्न होता है, तो उसके लिए देश में विधिक प्रक्रिया उपलब्ध है। न्यायालय के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल निजी लेन-देन के विवाद में पुलिस द्वारा किसी नागरिक को इस तरह प्रताड़ित किए जाने के आरोप बेहद गंभीर हैं और इस पूरे प्रकरण की उच्चाधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
वर्जन का इंतजार
इस पूरे सनसनीखेज मामले में सिक्के का दूसरा पहलू सामने आना अभी बाकी है। समाचार लिखे जाने तक इस संबंध में स्थानीय पुलिस प्रशासन अथवा दूसरे पक्ष (संदीप कुमार यादव) का कोई भी आधिकारिक बयान प्राप्त नहीं हो सका था। पुलिस और विपक्षी दल का पक्ष सामने आने के बाद ही इस पूरे प्रकरण की वास्तविक सच्चाई और स्थिति साफ हो सकेगी।
Author: fastblitz24



