नगर से तहसील और गांवों तक दिखी परंपरा की झलक, छठ माता के गीतों के बीच हुआ पूजन; तिन्नी चावल, महुआ और जल में पैदा होने वाली सामग्री का चढ़ाया प्रसाद
“मां ने रखा व्रत, गूंजे छठ माता के गीत… संतान की लंबी उम्र के लिए जौनपुर में गांव-गांव दिखी आस्था की अनोखी तस्वीर!”
जौनपुर। संतान की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से बुधवार को जौनपुर जिले में ललई छठ यानी हलषष्ठी का पर्व श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया गया। नगर से लेकर शादंग, केराकत, मड़ियाहूं, बदलापुर और मछलीशहर तहसील क्षेत्र तक तथा नौपेड़वा, धनियामऊ, मुफ्तीगंज, शीतलगंज, रामपुर और जलालपुर समेत ग्रामीण अंचलों में महिलाओं ने पारंपरिक विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया।
सुबह से ही घरों और पूजा स्थलों पर पर्व को लेकर उत्साह दिखाई दिया। व्रती महिलाओं ने स्नान कर व्रत का संकल्प लिया और सामूहिक रूप से छठ माता के गीत गाते हुए पूजा की। कई स्थानों पर महिलाएं तालाब, पोखरों और जलाशयों के किनारे पहुंचीं। पूजा के बाद कथा श्रवण और प्रसाद वितरण का सिलसिला चलता रहा।
हल से जुड़ी फसल का नहीं होता सेवन
ललई छठ की सबसे खास परंपराओं में हल से जुती हुई जमीन में पैदा होने वाले अनाज और सब्जियों का सेवन नहीं करना शामिल है। इसके स्थान पर तिन्नी का चावल, करमुआ का साग, पसही आदि जैसी जल या बिना हल से जुड़ी परंपरागत खाद्य सामग्री का प्रयोग किया जाता है। कई क्षेत्रों में भैंस के दूध, दही और घी का भी विशेष महत्व माना जाता है।
पूजन के दौरान महुआ, दही, तिन्नी का चावल, मिट्टी के कुल्हड़, दीया और अन्य पारंपरिक सामग्री से थाल सजाए गए। ग्रामीण अंचलों में महिलाओं ने गोबर से पूजा स्थल को लीपकर प्रतीकात्मक तालाब बनाया और उसमें झरबेरी, पलाश तथा कांस की डालियां लगाने की परंपरा भी निभाई।
बलराम जन्म से जुड़ी है मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। उनका प्रमुख अस्त्र हल माना जाता है, इसलिए इस पर्व को हलषष्ठी या हल छठ भी कहा जाता है। पूर्वांचल के कई क्षेत्रों में इसे ललई या ललही छठ के नाम से जाना जाता है। माताएं इस दिन अपनी संतान के स्वास्थ्य, सुरक्षा और दीर्घायु की कामना से व्रत रखती हैं।
लोककथा में छिपा है सत्य और मातृत्व का संदेश
ललई छठ से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा में एक ग्वालिन का प्रसंग आता है। कथा के अनुसार उसने परिस्थितिवश अपने बारे में असत्य कहा और बाद में उसके जीवन में संकट आया। पश्चाताप के बाद उसने श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत किया। लोकविश्वास है कि उसकी भक्ति और सत्य के संकल्प से संकट टल गया। इसी कथा के माध्यम से पर्व में सत्य बोलने, पश्चाताप, भक्ति और संतान की रक्षा की भावना को महत्व दिया गया है।
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा बनी पर्व की पहचान
जौनपुर के ग्रामीण इलाकों में ललई छठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि महिलाओं के सामूहिक लोकाचार का भी हिस्सा है। एक ही स्थान पर कई परिवारों की महिलाएं एकत्र होती हैं, पूजन करती हैं, कथा सुनती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं। बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को व्रत की परंपराएं और कथा सुनाती हैं। इस तरह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोक संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बना हुआ है।
नगर से लेकर गांवों तक बुधवार को इसी आस्था और विश्वास के बीच ललई छठ का पर्व संपन्न हुआ। पूजा स्थलों पर महिलाओं की सामूहिक मौजूदगी और छठ माता के गीतों से माहौल भक्तिमय बना रहा।




