
शहादत की अनदेखी, अपमान: जब अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी न जगा सका व्यवस्था की नींद
(फास्ट ब्लिट्ज विशेष)



भारतीय मिट्टी के कण-कण में वीरता की कहानियाँ रची-बसी हैं, लेकिन जौनपुर के एक लाल की कहानी जितनी गौरवशाली है, उतनी ही व्यवस्था के लिए शर्मनाक भी। यह कहानी है ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित शहीद इंस्पेक्टर ध्रुवलाल यादव की, जिनकी वीरता का लोहा सात समंदर पार ब्रिटेन की संसद ने माना, लेकिन अपने ही वतन की सरकारों और प्रशासन ने उन्हें फाइलों के ढेर में दबा दिया।
शहादत का वह ऐतिहासिक दिन: 21 अक्टूबर, 1994
घटना प्रदेश के सहारनपुर जिले की है। अक्टूबर 1994 में खूंखार आतंकवादियों ने कुछ विदेशी नागरिकों को बंधक बना लिया था। इस संकट की घड़ी में इंस्पेक्टर ध्रुवलाल यादव ने मोर्चे का नेतृत्व किया। बिना अपनी जान की परवाह किए, वह आतंकवादियों की गोलियों के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए।
परिणाम: विदेशी नागरिकों को सुरक्षित मुक्त करा लिया गया, लेकिन अदम्य साहस का परिचय देते हुए ध्रुवलाल यादव वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी इस वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘शौर्य चक्र’ से नवाजा।
जब ब्रिटेन की संसद में गूँजा जौनपुर का नाम
ध्रुवलाल यादव की शहादत केवल भारत तक सीमित नहीं रही। चूंकि उन्होंने विदेशी नागरिकों की जान बचाई थी, इसलिए ब्रिटेन की संसद (British Parliament) ने विशेष रूप से शोक प्रस्ताव पारित कर उनकी बहादुरी को सलाम किया। यह किसी भारतीय पुलिस अधिकारी के लिए दुर्लभ और सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय सम्मानों में से एक था।
तीन दशकों की ‘सरकारी’ और ‘प्रशासनिक’ निष्क्रियता
शहादत के 30 साल बाद भी शहीद के पैतृक गाँव, बरसठी ब्लॉक के गहरपुर अमिलिया में सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है:
- सरकारों की उदासीनता: 1994 से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश में कई विचारधाराओं की सरकारें आईं और गईं। हर चुनाव में शहीदों के नाम पर वोट माँगे गए, लेकिन ध्रुवलाल यादव की याद में एक पत्थर तक नहीं लगवाया गया।
- प्रशासनिक संवेदनहीनता: जिला प्रशासन, जौनपुर ने कभी इस फाइल को गंभीरता से नहीं लिया। क्या एक ‘शौर्य चक्र’ विजेता के लिए स्मारक और एक सड़क का नामकरण इतना कठिन कार्य था?
- खंडहर बना स्वास्थ्य केंद्र: शहीद के नाम पर गाँव में बना स्वास्थ्य केंद्र आज खुद ‘बीमार’ है। रखरखाव के अभाव में यह भवन खंडहर बन चुका है। यह शहीद की स्मृति का सम्मान नहीं, बल्कि उनकी शहादत का क्रूर मज़ाक है।
- स्थानीय संस्थाओं का मौन: तीन दशकों तक स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं और रसूखदारों का इस मुद्दे पर मौन रहना भी उनकी सामाजिक जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
सरकारों की उदासीनता: एक शर्मनाक इतिहास
1994 में शहादत के बाद से आज तक, उत्तर प्रदेश ने राजनीतिक और विचारधारात्मक रूप से कई बड़े बदलाव देखे हैं। यह केवल एक सरकार की विफलता नहीं है, बल्कि यह हर उस शासन की जवाबदेही है जिसने इस तीन दशक के अंतराल में राज्य का नेतृत्व किया।
- शहादत के समय और तत्काल बाद (1994-1996): जब शहादत हुई, तब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। इसके बाद राष्ट्रपति शासन और फिर अन्य गठबंधनों का दौर रहा। लेकिन, एक अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाने वाले शहीद को सम्मानित करने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई।
- अन्य प्रमुख सरकारों का दौर: इसके बाद, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकारें कई बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आईं। ये सभी सरकारें अलग-अलग समय पर शहीदों और देशप्रेम के नाम पर जनता से जनादेश मांगती रहीं। लेकिन, इनमें से किसी भी सरकार के मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्रियों ने ध्रुवलाल यादव के नाम पर एक भी स्मारक या सड़क का नामकरण करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।
इन तीन दशकों में उत्तर प्रदेश ने हर प्रमुख विचारधारा की सरकार देखी है।
- सपा और बसपा की सरकारों ने सामाजिक न्याय के नाम पर शासन किया।
- भाजपा की सरकारों ने राष्ट्रवाद और शौर्य के नाम पर जनसमर्थन जुटाया।
बावजूद इसके, जौनपुर के इस ‘शौर्य चक्र’ विजेता की स्मृति को सहेजने में किसी ने भी तत्परता नहीं दिखाई। लेख में इन नामों का संदर्भ देना इस बात को और मजबूती देगा कि यह किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था की सामूहिक विफलता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि हर चुनाव में शहीदों के नाम पर राजनीति करने वाले इन सभी दलों ने, सत्ता में आने के बाद शहीद ध्रुवलाल यादव की स्मृति को पूरी तरह से विस्मृत कर दिया। यह राजनीतिक दलों की उस खोखली देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है, जहां वे केवल सत्ता की खातिर शहीदों का नाम इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जब सम्मान देने की बारी आती है, तो वे उदासीन हो जाते हैं। 30 साल का यह सन्नाटा इन सभी सरकारों की निष्क्रियता और निंदा का सबसे बड़ा कारण है।
अंधेरे में उम्मीद की किरण: जज्बे को सलाम
इतने लंबे अंतराल के बाद, जब यादें धुंधली होने लगी थीं, तब ओबीसी महासभा और अंबेडकर मिशनरी एकता समिति जैसे संगठनों ने इस मशाल को फिर से जलाया है। मंगलवार को जिलाधिकारी को सौंपा गया ज्ञापन केवल कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने वाला दस्तावेज है।
गुजरात प्रदेश अध्यक्ष आलोक यादव, डॉ. नागेंद्र यादव, डॉ. विश्वनाथ यादव और शिक्षक नेता अंजनी कुमार श्रीवास्तव जैसे लोग प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने शहीद की धूल फांकती स्मृतियों को शासन के गलियारों तक पहुँचाया।
प्रमुख माँगें जो तुरंत पूरी होनी चाहिए:
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पैतृक गाँव में राजकीय सम्मान के साथ भव्य शहीद स्मारक का निर्माण।
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निगोह–सुरियावा मार्ग का तत्काल ‘शहीद ध्रुवलाल मार्ग’ के रूप में नामकरण।
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जर्जर स्वास्थ्य केंद्र का कायाकल्प और वहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की बहाली।
शहादत के कर्ज को कभी चुकाया नहीं जा सकता, लेकिन कम से कम उसे सम्मान देकर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति का पाठ तो पढ़ा ही सकते हैं।
अंत में
किसी राष्ट्र की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसके पास कितनी सेना है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने शहीदों को कितना सम्मान देता है। ध्रुवलाल यादव ने देश का मान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया था। अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार और जौनपुर प्रशासन अपनी 30 साल की नींद तोड़े।
Author: fastblitz24






