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​मिर्जापुर: ड्रमंडगंज घाटी बनी ‘यमराज’ की नई चौकी! बोलेरो में 2 मासूमों समेत 8 जिंदा जले;

   सिस्टम की ‘कंडम’ सोच ने ली 11 जान

[फास्ट ब्लिट्ज विशेष ग्राउंड रिपोर्ट]

मिर्जापुर: वाराणसी-रीवा नेशनल हाईवे (NH-7) पर स्थित ड्रमंडगंज घाटी बीती रात चीखों से गूंज उठी। यह सिर्फ़ एक सड़क हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा किया गया सामूहिक नरसंहार है। मध्यप्रदेश से चना लादकर आ रहे एक ‘मौत के सौदागर’ (अनियंत्रित ट्रक) ने ब्रेक फेल होने का बहाना बनाकर ऐसा तांडव मचाया कि 11 हंसते-खेलते परिवार उजड़ गए। सबसे खौफनाक मंजर बोलेरो में दिखा, जहाँ एक ही परिवार के 8 लोग, जिनमें 5 और 8 साल के दो मासूम भी शामिल थे, राहगीरों के सामने तड़प-तड़पकर जिंदा राख बन गए।

सिस्टम के मुंह पर तमाचा: ‘ब्लेड पॉइंट्स’ में हकीकत

  • 45 मिनट का ‘डेथ वॉच’: बोलेरो धू-धू कर जलती रही, अंदर से चीखें आती रहीं, लेकिन 45 मिनट तक न पुलिस पहुंची, न फायर ब्रिगेड। राहगीर बेबस होकर मोबाइल से मौत का ‘लाइव टेलीकास्ट’ रिकॉर्ड करते रहे। क्या हमारी इमरजेंसी सेवाएं सिर्फ़ कागजों पर दौड़ती हैं?
  • शिनाख्त का खौफ: शिनाख्त के लिए सिर्फ़ जली हुई हड्डियां, गहनों के टुकड़े और अधजले कपड़े बचे थे। प्रशासन के पास इस भयानक मंजर का कोई जवाब नहीं है।
  • हत्यारा ट्रक: जिम्मेदार कौन?: ट्रक कंडम था, ओवरलोड था और ब्रेक फेल थे। आरटीओ (RTO) विभाग और हाईवे पुलिस क्या सिर्फ़ अवैध वसूली के लिए नाकों पर खड़ी रहती है? ऐसे ‘किलर ट्रक्स’ को हाईवे पर एंट्री कैसे मिली?

FIR: औपचारिकता या इंसाफ की उम्मीद?

मृतक कार चालक जयप्रकाश के भाई ओमप्रकाश ने ड्रमंडगंज थाने में ट्रक चालक (जिसकी बाद में अस्पताल में मौत हो गई) के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। FIR में लापरवाही, ओवरलोडिंग और कंडम गाड़ी चलाने के गंभीर आरोप हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ मरे हुए ड्राइवर पर केस दर्ज करने से इंसाफ मिल जाएगा? उन अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी जिन्होंने इस ट्रक को सड़क पर चलने की अनुमति दी?

फास्ट ब्लिट्ज विश्लेषण:

क्यों लग रही है ड्रमंडगंज में ‘मौत की मंडी’?

  1. प्रशासनिक लकवा: तीखा ढलान जगजाहिर है, लेकिन ‘बड़का मोड़’ से पहले पर्याप्त स्पीड ब्रेकर या रंबल स्ट्रिप्स आज तक नहीं लगे।
  2. लापरवाही का ढलान: घाटी में ‘लोअर गियर’ की चेतावनियां सिर्फ़ बोर्ड्स पर हैं, जमीन पर कोई चेकिंग दस्ता नहीं होता।
  3. इलाज नहीं, सिर्फ़ रेफर: ट्राउमा सेंटर 80 किमी दूर है। ‘गोल्डन ऑवर’ में घायल सिर्फ़ एम्बुलेंस में दम तोड़ते हैं।

सिस्टम पर सीधा प्रहार:

आखिर कब तक साहब?

हादसे के बाद साहब लोग (DM और SP) रात 11 बजे मौका-ए-वारदात पर पहुंचे। ब्रीफिंग हुई, मुआयना हुआ, और हमेशा की तरह ‘आश्वासन के पैकेट’ बांटे गए। लेकिन ड्रमंडगंज की घाटी को ‘डेथ वैली’ बने रहने से रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

 दो टूक:

आज ड्रमंडगंज की डामर पर बिखरा खून और जली हुई हड्डियां प्रशासन से जवाब मांग रही हैं। यह सिर्फ़ ब्रेक फेलियर नहीं, यह नैतिक जिम्मेदारी का फेलियर है। अगर अब भी घाटी के ढलानों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हुए, तो समझ लीजिए कि अगली बारी आपकी या हमारी हो सकती है। प्रशासन जाग जाओ, वरना मौत का यह सिलसिला कभी नहीं थमेगा!

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Author: fastblitz24

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