सांसें दे रहे वट वृक्ष खुद मांग रहे जीवनदान
सुहागिनों ने कंक्रीट के बीच तलाशी आस्था की छांव
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वट सावित्री अमावस्या पर कृषि भवन और नवदुर्गा मंदिर में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
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विकास की भेंट चढ़ रहे पेड़ बने चिंता का विषय; सिर्फ रस्म नहीं, पर्यावरण का आधार है यह पर्व
जौनपुर।शनिवार को जनपद में वट सावित्री अमावस्या का पर्व परंपरागत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। अखंड सौभाग्य की कामना को लेकर सुहागिन महिलाओं ने वट (बरगद) वृक्ष की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर उसके चारों ओर सूत का धागा लपेटा और पति की लंबी उम्र व परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। हालांकि, इस बार के पर्व में श्रद्धा के साथ-साथ एक नई चिंता भी तैरती नजर आई—शहरों में तेजी से कंक्रीट के बढ़ते जंगल और घटते वट वृक्ष।


मंदिरों और रेलवे परिसरों में उमड़ी भारी भीड़
नगर में वट वृक्षों की संख्या धीरे-धीरे कम होने के कारण इस बार महिलाएं सुविधाजनक, सुरक्षित और स्वच्छ स्थानों पर पूजा के लिए जुटीं। नगर के कृषि भवन स्थित मंदिर परिसर में सुबह से ही बड़ी संख्या में महिलाओं का तांता लगा रहा। इसी प्रकार सद्भावना पुल स्थित नवदुर्गा मंदिर परिसर में मौजूद वट वृक्ष पर महिलाओं ने जल, मौली, रोली, फल और भीगे हुए चने अर्पित कर फेरी लगाई। इसके अलावा जौनपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन परिसर, लाइनबाजार और रेलवे कॉलोनी में स्थित वट वृक्षों पर भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।


पर्व का माहात्म्य और पूजन विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन सती सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और पातिव्रत्य धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस मांग लिए थे। वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों का वास माना जाता है।
पूजन विधि: सुहागिनों ने सुबह स्नान के बाद नए वस्त्र और आभूषण पहनकर श्रृंगार किया। इसके बाद वट वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान और यमराज की मिट्टी की मूर्तियां स्थापित कीं। वृक्ष की जड़ में जल अर्पित कर दीप जलाया गया। बांस के पंखे से हवा करने की परंपरा को निभाते हुए महिलाओं ने वट वृक्ष को पंखा झला। इसके बाद वृक्ष के चारों ओर 7 या 108 बार सूत का कच्चा धागा लपेटकर परिक्रमा की और अंत में व्रत कथा सुनी।

विशेष आलेख: कंक्रीट के जंगल में सिमटते ‘देव वृक्ष’, आस्था के केंद्र पर बढ़ी भीड़
वट सावित्री का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति का प्रकृति से जुड़ाव का सबसे बड़ा प्रमाण है। हमारे पूर्वजों ने बरगद को ‘देव वृक्ष’ मानकर पूजने की परंपरा इसलिए बनाई ताकि इंसान इस जीवनदायिनी पेड़ का संरक्षण कर सके। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बरगद चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाला और पर्यावरण को शुद्ध रखने वाला सबसे मजबूत स्तंभ है।
अंधाधुंध कटान ने बढ़ाई सुहागिनों की मुश्किलें
आज विकास और शहरीकरण की अंधी दौड़ में सबसे ज्यादा गाज इन्हीं विशालकाय वट वृक्षों पर गिर रही है। जौनपुर जनपद और उसके आसपास के क्षेत्रों में सड़कों के चौड़ीकरण और बहुमंजिला इमारतों के निर्माण के नाम पर सैकड़ों वर्ष पुराने बरगद के पेड़ काट दिए गए। नए पौधे लगाने की सुध किसी ने नहीं ली।
कम होते पेड़, बढ़ती भीड़ और ‘कृत्रिम’ विकल्प
नतीजा यह है कि आज शहरों के गिने-चुने कोनों में ही वट वृक्ष बचे हैं। पेड़ों की संख्या कम होने के कारण इस बार वट सावित्री पर उन चुनिंदा स्थानों (जैसे कृषि भवन, नवदुर्गा मंदिर और रेलवे परिसर) पर पैर रखने की जगह नहीं थी, जहाँ बरगद के पेड़ सुरक्षित हैं। बढ़ती भीड़ और कंक्रीट के फर्श के बीच महिलाओं को पूजा करने में भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। कई जगहों पर तो महिलाएं पार्कों में गमलों में लगी बरगद की छोटी टहनियों या कृत्रिम रूप से मंगाई गई डालियों की पूजा करने को मजबूर दिखीं।
वक्त की पुकार: संरक्षण ही असली पूजा
यदि पेड़ों के कटने का यही सिलसिला जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियां इस पावन पर्व को सिर्फ गमलों या तस्वीरों में मनाने पर मजबूर हो जाएंगी। वट सावित्री पर्व की सार्थकता तभी है, जब सुहागिनें पति की लंबी उम्र की कामना के साथ-साथ इस धरती की ‘लंबी उम्र’ के लिए भी संकल्प लें। आज जरूरत इस बात की है कि हर परिवार इस पर्व पर कम से कम एक बरगद या पीपल का पौधा अवश्य लगाए और उसका संरक्षण करे, ताकि हमारी आस्था की छांव और पर्यावरण की सांसें दोनों सुरक्षित रह सकें।
Author: fastblitz24

