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जौनपुर में सिस्टम की क्रूरता: न्याय की आस में टावर पर चढ़ा युवक, प्रशासनिक असंवेदनशीलता ने ली जान

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​सात साल की कानूनी लड़ाई, कथित रसूखदारों का दबाव और एक बेबस युवा की मौत

; फास्ट ब्लिट्ज’ की शैली में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाती एक जमीनी रिपोर्ट।

जौनपुर: प्रदेश के जौनपुर जिले में एक बार फिर प्रशासनिक सुस्ती और रसूखदारों के कथित दबाव ने एक आम नागरिक की जान ले ली। बक्शा थाना क्षेत्र के उतरेजपुर गांव में जमीन की पैमाइश के विवाद को लेकर वर्षों से न्याय की गुहार लगा रहे एक युवक श्रीप्रकाश यादव की मोबाइल टावर से गिरकर संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। यह घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि उस नौकरशाही के मुंह पर करारा तमाचा है जो फाइलों के नीचे दबे रसूख और गरीब की चीख में फर्क करना भूल चुकी है।

​यह त्रासदी सीधे तौर पर जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर क्यों एक नागरिक को अपनी जायज मांग के लिए मौत का रास्ता चुनना पड़ा?

​जब मौत के मुहाने पर जागा प्रशासन

​घटनाक्रम किसी थ्रिलर फिल्म जैसा था, लेकिन इसका अंत बेहद दर्दनाक रहा। शुक्रवार सुबह करीब साढ़े सात बजे, जब पूरा प्रशासनिक अमला अपनी सुस्ती तोड़ रहा था, श्रीप्रकाश यादव व्यवस्था के खिलाफ अपना अंतिम विरोध दर्ज कराने के लिए मोबाइल टावर पर चढ़ गए। उनका सीधा आरोप था कि राजस्व विभाग ने प्रभावशाली लोगों के दबाव में आकर उनकी जमीन की गलत पैमाइश की और ‘पत्थर गड्डी’ कर दी।

असमंजस और नाकामी की टाइमलाइन:

  • सुबह 07:30 बजे: युवक टावर पर चढ़ा, पुलिस और राजस्व टीम मौके पर पहुंची।
  • घंटों की बातचीत: प्रशासन युवक को नीचे उतारने के बजाय केवल “समझाने-बुझाने” की रस्म अदायगी करता रहा।
  • दोपहर 02:00 बजे: जब दबाव बढ़ा, तो आनन-फानन में जमीन की दोबारा नापी शुरू की गई। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसी दौरान श्रीप्रकाश संदिग्ध परिस्थितियों में नीचे गिर गए।

​सवाल यह उठता है कि जो पैमाइश दोपहर दो बजे आनन-फानन में शुरू की जा सकती थी, उसके लिए प्रशासन ने सात साल का वक्त क्यों लिया? क्या भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था केवल तभी हरकत में आती है जब किसी की जान दांव पर लगी हो?

​२०१६ से जारी था ‘फाइली’ दमन

​मृतक के भाई जयशंकर यादव के बयानों ने इस पूरे तंत्र के भ्रष्टाचार और पक्षपात को उजागर कर दिया है। यह विवाद साल 2016 से उपजिलाधिकारी (एसडीएम) कोर्ट में लंबित था। साल 2019 में कथित तौर पर गलत पैमाइश कर पीड़ित परिवार की जमीन हड़पने की कोशिश की गई।

​हद तो तब हो गई जब विवादित जमीन पर जिला पंचायत द्वारा सड़क निर्माण की तैयारी शुरू कर दी गई। यह सीधे तौर पर एक बेबस किसान को मानसिक रूप से तोड़ने की प्रशासनिक साजिश थी। रसूखदारों के दबाव में अंधी हो चुकी व्यवस्था ने पीड़ित की हर उस शिकायत को रद्दी की टोकरी में डाल दिया, जो वह पिछले कई सालों से कर रहा था।

​जांच समितियों का घिसा-पिटा ढर्रा

​घटना के बाद हमेशा की तरह जिलाधिकारी सैमुअल पॉल एन. और पुलिस अधीक्षक ने जिला अस्पताल पहुंचकर परिजनों को “कठोर कार्रवाई” का झुनझुना थमा दिया है। अपर जिलाधिकारी (एडीएम) के नेतृत्व में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी गई है।

लेकिन फॉस्ट ब्लिट्ज’ के नजरिए से कुछ सुलगते सवाल:

  • ​क्या यह जांच समिति उस मानसिक प्रताड़ना का हिसाब कर पाएगी जो श्रीप्रकाश ने पिछले 7 सालों में झेली?
  • ​क्या उन राजस्व अधिकारियों को सह-आरोपी बनाया जाएगा जिन्होंने 2019 में कथित तौर पर गलत पैमाइश की थी?
  • ​क्या जिला प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति कर इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहा है?

​    तनाव के साए में उतरेजपुर

​फिलहाल उतरेजपुर गांव में भारी पुलिस बल तैनात है। माहौल में गम कम और आक्रोश ज्यादा है। यह घटना साबित करती है कि जब न्याय के दरवाजे रसूखदारों के इशारे पर बंद हो जाते हैं, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और प्रशासनिक दावों की धज्जियां उड़ जाती हैं। श्रीप्रकाश यादव की मौत एक प्रशासनिक हत्या है, और जब तक इसके दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, जौनपुर का यह घाव कभी नहीं भरेगा।

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Author: fastblitz24

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