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तमिलनाडु:धर्मनिरपेक्षता’ के मुलम्मे में गहरा षड्यंत्र? क्यों 87% हिंदुओं के राज्य में ‘सनातन विरोध’ है सत्ता की चाबी

​’वोट बैंक’ का सामाजिक षड्यंत्र: कैसे 87% बहुसंख्यकों को जातियों में बांटकर तमिलनाडु में राज कर रहे हैं सनातन विरोधी

       (नेशनल ब्यूरो )

       नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीति को लेकर उत्तर भारत में अक्सर एक बड़ा कौतूहल रहता है। कौतूहल यह कि जिस राज्य में 87.58% आबादी हिंदू है, वहां सनातन धर्म या हिंदू प्रतीकों के विरोध को राजनीति का मुख्य हथियार कैसे बनाया जा सकता है? पहली नजर में यह सिर्फ एक राजनीतिक चालबाजी या चुनावी गणित लग सकता है, लेकिन अगर इसके इतिहास, आंकड़ों और जमीनी हकीकत को परत-दर-परत खोलें, तो यह एक गहरा सामाजिक षड्यंत्र नजर आता है।

​यह एक ऐसा षड्यंत्र है जहां बहुसंख्यक समाज को ‘हिंदू’ के रूप में एकजुट होने ही नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें जातियों के ऐसे जाले में उलझा दिया गया कि वे अपनी बड़ी धार्मिक पहचान भूलकर सिर्फ अपनी जाति के दायरे में सोचने को मजबूर हो गए।

​यह कोई संयोग नहीं, बल्कि दशकों से तैयार किया गया एक सांस्कृतिक विभाजन का मॉडल है। द्रविड़ दलों ने तीन स्तरों पर इस षड्यंत्र को अंजाम दिया है:

​1. ‘तमिल बनाम संस्कृत/हिंदी’ का कृत्रिम नैरेटिव (Fake Narrative)

​द्रविड़ राजनीति की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने ‘सनातन धर्म’ को उत्तर भारत, संस्कृत भाषा और ब्राह्मणवाद से जोड़कर पेश किया। उन्होंने तमिल जनता के मन में यह बात बैठा दी कि ‘सनातन’ का मतलब है उत्तर भारत का सांस्कृतिक प्रभुत्व।

  • नतीजा: आम तमिल हिंदू के सामने स्थिति यह बना दी गई कि यदि वह सनातन के पक्ष में खड़ा होगा, तो उसे अपनी प्रिय ‘तमिल भाषा और अस्मिता’ से समझौता करना पड़ेगा। इस तरह अपनी भाषा के प्रति अगाध प्रेम को राजनीतिक दलों ने हिंदू पहचान के खिलाफ इस्तेमाल कर लिया।

​2. बहुसंख्यक समाज का ‘कास्ट-इंजीनियरिंग’ से विखंडन

​तमिलनाडु में करीब 87.58% हिंदू आबादी है। राजनीति के धुरंधरों को पता था कि अगर यह आबादी एक हो गई, तो उनका पत्ता साफ हो जाएगा। इसलिए उन्होंने पूरे समाज को जातियों के ऐसे मकड़जाल में बांटा कि कोई खुद को हिंदू सोच ही न पाए।

क्षेत्र

प्रभावी हिंदू जातियां

राजनीतिक स्थिति

उत्तरी तमिलनाडु

वन्नियार (Vanniyar)

अपनी जाति के क्षत्रपों के पीछे गोलबंद

दक्षिणी तमिलनाडु

थेवर (Thevar)

जातिगत गौरव के आधार पर वोटिंग

पश्चिमी तमिलनाडु

गौंडर (Gounder)

आर्थिक

           जब 87% समाज वन्नियार, थेवर और गौंडर में बंट गया, तो वह एक राजनीतिक इकाई के रूप में खत्म हो गया। इसके विपरीत, राज्य की लगभग 12% अल्पसंख्यक (मुस्लिम और ईसाई) आबादी पूरी तरह एकजुट होकर द्रविड़ गठबंधन के पक्ष में खड़ी रहती है। यह बिखरे हुए हिंदू बनाम एकजुट अल्पसंख्यक का ऐसा गणित है जो सनातन विरोधियों को अजेय बना देता है।

​3. 69% आरक्षण: आर्थिक मजबूरी का राजनीतिक फायदा

​तमिलनाडु में लागू 69% आरक्षण वहां के हिंदू समाज की सबसे बड़ी आर्थिक जरूरत बन चुका है। द्रविड़ दलों (DMK और AIADMK) ने जनता के बीच यह डर पैदा कर दिया है कि अगर कोई ‘राष्ट्रवादी’ या ‘हिंदूवादी’ दल सत्ता में आया, तो उनका यह आरक्षण छीन लिया जाएगा।

आरक्षण का ढांचा

कोटा

लाभार्थी

BC (पिछड़ा वर्ग)

30%

बहुसंख्यक हिंदू जातियां

MBC (अति पिछड़ा वर्ग)

20%

मध्यवर्ती हिंदू समाज

SC/ST (दलित/आदिवासी)

19%

वंचित वर्ग

          इस कोटे का लाभ सीधे तौर पर राज्य के 85% से अधिक हिंदू परिवारों को मिलता है। यही कारण है कि जब द्रविड़ नेता सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू-मलेरिया’ से करते हैं, तब भी वहां का आम हिंदू अपने बच्चों के भविष्य और नौकरी (69% कोटे) के डर से मूकदर्शक बना रहता है।

​सत्ता भी उनकी, विपक्ष भी उनका: वैचारिक एकाधिकार का खेल

​तमिलनाडु की सबसे खतरनाक राजनीतिक परिस्थिति यह है कि वहां विपक्ष भी वैचारिक रूप से सत्ता पक्ष जैसा ही है।

  • DMK (सत्ता पक्ष): पेरियार की कट्टर नास्तिक और ब्राह्मण-विरोधी विचारधारा को खुलेआम आगे बढ़ाती है।
  • AIADMK (मुख्य विपक्ष): हालांकि एमजीआर और जयललिता के समय यह पार्टी धार्मिक रूप से थोड़ी उदार थी, लेकिन इसका मूल ढांचा भी द्रविड़ आंदोलन से ही निकला है। यह दल भी ‘तमिल अस्मिता’ और ‘69% आरक्षण’ के मुद्दे पर डीएमके की भाषा बोलने को मजबूर है ताकि इसका वोट बैंक न खिसके।

परिणाम: तमिलनाडु के वोटर के पास कोई तीसरा मजबूत विकल्प ही नहीं बचता। अगर वह सत्ता पक्ष से नाराज भी होगा, तो उसे दूसरे द्रविड़ दल को ही चुनना पड़ेगा, जिसकी जड़ें भी उसी सनातन-विरोधी विचार में हैं।

सामाजिक न्याय का ढोंग: दलितों पर अत्याचार में तमिलनाडु आगे

​इस पूरी राजनीति को ‘सामाजिक षड्यंत्र’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि जिस ‘द्रविड़ मॉडल’ का दावा जातिवाद मिटाने का था, उसने जातियों के बीच नफरत को और बढ़ा दिया।

  • हकीकत का आईना: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े गवाह हैं कि तमिलनाडु में दलितों (SC) के खिलाफ होने वाले अत्याचारों में कोई कमी नहीं आई है।
  • दबंग कौन?: चौंकाने वाली बात यह है कि दलितों पर अत्याचार करने वाले लोग कोई मुट्ठी भर ऊंची जाति (ब्राह्मण) के नहीं हैं, बल्कि वे मध्यवर्ती पिछड़ी जातियां (OBC/MBC) हैं, जो द्रविड़ आंदोलन की सबसे बड़ी लाभार्थी रही हैं।
  • ​आज भी तमिलनाडु के सैकड़ों गांवों में दलितों को मंदिरों में घुसने से रोका जाता है, उनके खिलाफ हिंसा होती है। यह साबित करता है कि आंदोलन ने समाज को सुधारा नहीं, बल्कि केवल सत्ता हथियाने के लिए जातियों को आपस में लड़ा दिया।

​’अल्पसंख्यक एकजुट, बहुसंख्यक खंडित’ का चुनावी मॉडल

​इस षड्यंत्र का सबसे अंतिम और अचूक हिस्सा है—चुनावी समीकरण

​तमिलनाडु में करीब 6% ईसाई और 6% मुस्लिम आबादी है। यह 12% आबादी पूरी तरह एकजुट होकर द्रविड़ गठबंधन (मुख्यतः डीएमके) को वोट करती है। दूसरी तरफ, 87% हिंदू समाज जातियों में बिखरा हुआ है।

​जब भी द्रविड़ दलों की सरकारें अपनी प्रशासनिक विफलताओं, बिजली संकट या भ्रष्टाचार पर घिरती हैं, तो वे तुरंत ‘सनातन विरोध’, ‘उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत’ या ‘हिंदी थोपने का विरोध’ जैसे भावनात्मक मुद्दे उछाल देती हैं। ऐसा करके वे बिखरे हुए हिंदू वोटरों का ध्यान भटकाती हैं और अल्पसंख्यकों को यह संदेश देती हैं कि वे ही उनके सच्चे रक्षक हैं।

आस्था दिल में, वोट जाति को

फ़ास्ट ब्लिट्ज 24 की पड़ताल का सीधा निष्कर्ष यही है कि तमिलनाडु का आम नागरिक नास्तिक नहीं है। वह सुबह उठकर भव्य चोल और पांड्य कालीन मंदिरों में पूरी आस्था के साथ सिर झुकाता है, माथे पर विभूति (भस्म) लगाता है। लेकिन जब वह पोलिंग बूथ पर जाता है, तो द्रविड़ दलों द्वारा दशकों से दिमाग में भरे गए ‘भाषाई गौरव’ और ‘जातिगत असुरक्षा’ के जाल में फंस जाता है।

​यही वह सामाजिक षड्यंत्र है जिसने 87% बहुसंख्यकों के देश के एक सबसे बड़े राज्य को अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों (सनातन धर्म) के विरोध पर मूकदर्शक बने रहने के लिए मजबूर कर दिया है।

​फ़ास्ट ब्लिट्ज 24 निष्कर्ष: यह सेक्युलरिज्म नहीं, वैचारिक बंधक होने की कहानी है

​इसे ‘हिंदुओं का सेक्युलर होना’ कहना जमीनी हकीकत से आंखें मूंदना है। सच तो यह है कि तमिलनाडु का हिंदू राजनीतिक और आर्थिक रूप से बंधक बना लिया गया है। वह व्यक्तिगत जीवन में परम सनातनी है—वह रामेश्वरम जाता है, मुरुगन की पूजा करता है, कावड़ उठाता है। लेकिन वोट देते समय उसे अपनी जाति की सुरक्षा, आरक्षण का लाभ और तमिल अस्मिता का कार्ड दिखा दिया जाता है।

​जब तक तमिलनाडु में कोई राजनीतिक विकल्प ‘तमिल अस्मिता’ और ‘सनातन गौरव’ को एक साथ जोड़कर जनता के सामने नहीं रखता, तब तक सामाजिक और सांस्कृतिक षड्यंत्र का यह द्रविड़ मॉडल बहुसंख्यकों के राज्य में सनातन के अपमान की स्क्रिप्ट लिखता रहेगा।

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Author: fastblitz24

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