नारे से गाली तक: क्या यही है नई पीढ़ी की क्रांति?

— जब विरोध की भाषा मर्यादा खो देती है, तब आंदोलन अपना नैतिक अधिकार भी खो देता है
लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्र आंदोलनों का अपना विशिष्ट महत्व है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं ने व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाई, तब-तब सत्ता को जनभावनाओं के प्रति जवाबदेह होना पड़ा। हाल ही में CJP द्वारा NEET पेपर लीक के मुद्दे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर चलाया गया आंदोलन भी इसी लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा था। लगभग एक महीने से अधिक समय तक चले इस आंदोलन में बड़ी संख्या में Gen Z के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता की मांग स्वाभाविक और लोकतांत्रिक थी। किंतु आंदोलन के दौरान कुछ स्थानों पर सामने आए अश्लील, अभद्र और व्यक्तिगत अपमान से जुड़े नारों ने एक अलग और अधिक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया—क्या हमारी सार्वजनिक भाषा का स्तर बदल रहा है?

भारत ने इससे पहले भी अनेक छात्र आंदोलनों का इतिहास देखा है। स्वतंत्रता आंदोलन, जेपी आंदोलन, असम आंदोलन, मंडल आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, निर्भया आंदोलन और अनेक विश्वविद्यालयों के छात्र संघर्ष—इन सभी में सत्ता के विरुद्ध तीखे और प्रभावशाली नारे लगे। उन नारों में राजनीतिक व्यंग्य था, वैचारिक प्रतिरोध था और व्यवस्था को चुनौती देने का साहस था। किंतु सार्वजनिक मंचों पर अश्लीलता या व्यक्तिगत गरिमा पर आघात सामान्य राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा नहीं बन पाया था। यही वह अंतर है, जो आज चिंता का विषय बनता है।

प्रश्न केवल किसी एक आंदोलन या किसी एक संगठन का नहीं है। यह उस व्यापक सामाजिक परिवर्तन का प्रश्न है, जो धीरे-धीरे सार्वजनिक संवाद की भाषा को प्रभावित करता दिखाई देता है। यदि विरोध की भाषा विचारों से हटकर अपमान और अशिष्टता की ओर चली जाए, तो उसका प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता; वह समाज के नैतिक वातावरण को भी प्रभावित करता है।
इस परिवर्तन के पीछे अनेक सामाजिक कारण हो सकते हैं। पिछले दो दशकों में भारतीय परिवारों की संरचना में उल्लेखनीय बदलाव आया है। संयुक्त परिवारों के स्थान पर एकल परिवारों का विस्तार हुआ है। पहले बच्चों के व्यवहार पर केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची और परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्यों की भी निरंतर दृष्टि रहती थी। अनुशासन और सामाजिक मर्यादाएँ सामूहिक अनुभव का हिस्सा थीं। आज यह व्यवस्था पहले जैसी नहीं रह गई है।
इसके साथ ही आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने भी परिवारों की भूमिका को चुनौती दी है। माता-पिता दोनों के कार्यरत होने से बच्चों के साथ संवाद का समय कई परिवारों में सीमित हुआ है। बेहतर शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा और आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना निस्संदेह आवश्यक है, किंतु व्यक्तित्व का निर्माण केवल संसाधनों से नहीं होता। बच्चों को समय, संवाद, नैतिक मार्गदर्शन और सामाजिक संवेदनशीलता की भी आवश्यकता होती है। यदि यह स्थान खाली रह जाए, तो उसे कोई न कोई दूसरा माध्यम भर देता है।
वह माध्यम आज प्रायः डिजिटल संसार है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, शॉर्ट वीडियो, ओटीटी सामग्री और वायरल संस्कृति ने युवाओं की भाषा और अभिव्यक्ति पर गहरा प्रभाव डाला है। एल्गोरिद्म अक्सर संयमित विचारों की अपेक्षा उत्तेजक और टकरावपूर्ण सामग्री को अधिक दृश्यता देते हैं। परिणामस्वरूप आक्रामक भाषा को सामान्य, और कभी-कभी आकर्षक, अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाने लगता है।
युवाओं के सामाजिक व्यवहार में भी एक सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देता है। मित्रों के बीच मज़ाक में प्रयुक्त अपमानजनक शब्द धीरे-धीरे सामान्य बातचीत का हिस्सा बन जाते हैं। जो भाषा कभी निजी दायरे तक सीमित थी, वही सार्वजनिक मंचों और आंदोलनों में भी सुनाई देने लगती है। यह परिवर्तन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का प्रश्न है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कुछ घटनाओं के आधार पर पूरी Gen Z पीढ़ी का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। यही पीढ़ी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शोध, उद्यमिता, खेल, सेना और सामाजिक सेवा के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ भी हासिल कर रही है। इसलिए आलोचना का केंद्र पूरी पीढ़ी नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद में उभरती वह प्रवृत्ति होनी चाहिए, जो असहमति को अभद्रता से जोड़ने लगी है।
लोकतंत्र की शक्ति विरोध में नहीं, बल्कि सभ्य विरोध में निहित है। राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और सामाजिक आंदोलनों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे अपने समर्थकों को स्पष्ट संदेश दें कि वैचारिक संघर्ष और व्यक्तिगत अपमान दो अलग-अलग बातें हैं। किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति उसके तर्क, अनुशासन और भाषा से निर्मित होती है।
परिवारों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को भी नागरिक शिष्टाचार और संवाद की संस्कृति को पुनः केंद्र में लाना होगा। डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल तकनीक का उपयोग नहीं, बल्कि सार्वजनिक अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी को समझना भी होना चाहिए। सोशल मीडिया कंपनियों और कंटेंट निर्माताओं की भी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे ऐसे वातावरण को प्रोत्साहित न करें जिसमें अपमानजनक भाषा ही लोकप्रियता का सबसे आसान माध्यम बन जाए।
आंदोलन लोकतंत्र की ऊर्जा हैं। लेकिन जब नारे तर्क से अधिक अपमान का माध्यम बन जाते हैं, तो वे अपने उद्देश्य को स्वयं कमजोर कर देते हैं। लोकतंत्र में असहमति जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक उसकी भाषा की मर्यादा भी है। यदि समाज इस संतुलन को खो देता है, तो नुकसान किसी सरकार या किसी विपक्ष का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का होता है।




