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कालीघाट के किले का पतन और ममता का ‘राजनीतिक विसर्जन’

विशेष लेख

           राजनीति में अहंकार की उम्र बहुत छोटी होती है, और पश्चिम बंगाल की सत्ता का यह सूर्य आज उसी अहंकार की भेंट चढ़ गया। 2026 के चुनावी परिणामों ने यह साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता ने ‘हठधर्मिता’ के ऊपर ‘लोकतंत्र’ को चुना है। ममता बनर्जी, जिन्होंने कभी संघर्ष की कोख से जन्म लिया था, आज अपने ही बनाए ‘कैडर-तंत्र’ और केंद्र से व्यर्थ की ‘रार’ के मलबे के नीचे दब गई हैं।

​1. केंद्र से ’36 का आंकड़ा’: संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार

​ममता बनर्जी का राजनीतिक पतन उनकी उस कार्यशैली का परिणाम है, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकारों को सहयोग के बजाय सदैव शत्रुता की दृष्टि से देखा।

  • एजेंसियों पर हमला: सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स जैसी केंद्रीय संस्थाओं को उन्होंने राज्य की सीमा पर रोकने की कोशिश की। सरकारी जांच को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ का नाम देकर उन्होंने भ्रष्टाचारियों को जो कवच प्रदान किया, वही उनकी हार का सबसे बड़ा कारण बना।
  • केंद्रीय बलों का अपमान: सुरक्षा बलों और चुनाव आयोग को चुनौती देना उनकी आदत बन गई थी, लेकिन 2026 में जनता ने उनके इस ‘युद्धघोष’ को नकार दिया।

​2. मालदा का ‘कलंक’: जब लोकतंत्र के मंदिर में बंधक बने न्याय के देवता

​बंगाल के इतिहास में अप्रैल 2026 की वह तारीख काले अक्षरों में दर्ज होगी, जब मालदा के मोताबारी में सत्ता संरक्षित भीड़ ने न्यायपालिका की गरिमा को तार-तार कर दिया।

  • जजों की घेराबंदी: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के लिए आए 7 न्यायिक अधिकारियों (जिनमें 3 महिला जज शामिल थीं) को 9 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया।
  • प्रशासनिक मिलीभगत: जिला मजिस्ट्रेट (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) का मौके पर न पहुंचना यह साफ करता है कि यह घटना ‘हादसा’ नहीं बल्कि ‘सुनियोजित साजिश’ थी।
  • NIA की एंट्री: इस घटना ने ममता सरकार के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार और जांच का जिम्मा NIA को सौंपे जाने ने दिल्ली को यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि बंगाल में कानून का नहीं, बल्कि ‘जंगलराज’ का शासन है।

​3. ‘SIR’ का सर्जिकल स्ट्राइक: 91 लाख फर्जी वोटों का सफाया

​ममता की सत्ता की असली ताकत ‘वोटर लिस्ट’ का वह खेल था, जिसे चुनाव आयोग के माइक्रो-मैनेजमेंट ने ध्वस्त कर दिया। मालदा में 42,000 नाम कटने पर जो कोहराम मचा, वह असल में टीएमसी के उस ‘फर्जी वोट बैंक’ का दर्द था, जिसके दम पर वे वर्षों से राज कर रही थीं। राज्य भर में 91 लाख नामों की ‘सर्जरी’ ने सत्ता के समीकरणों को जड़ से हिला दिया।

​4. 4 मई के बाद का बंगाल: विद्रोह या विकास?

​रुझानों में पिछड़ने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पुरानी छवि के अनुरूप ‘सड़क पर संग्राम’ शुरू करेंगी?

  • अनिश्चितकालीन जाम की धमकी: ममता का कैडर पूरे बंगाल को ‘ग्रिडलॉक’ में फंसाने की ताकत रखता है, लेकिन केंद्र की 2 लाख CRPF और बख्तरबंद गाड़ियां किसी भी दुस्साहस को कुचलने के लिए मुस्तैद हैं।
  • पड़ोसी देशों पर असर: ममता की विदाई के साथ ही सीमा पार (बांग्लादेश) से होने वाली घुसपैठ और ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ के एजेंडे पर पूर्ण विराम लगना तय है। एक राष्ट्रवादी सरकार के आने से बंगाल की सीमाएं अब ‘सुरक्षित’ होंगी, ‘सौदा’ नहीं।

​5. निष्कर्ष: नंदीग्राम की वह हार, जो बनी काल

​ममता बनर्जी की सबसे बड़ी भूल 2021 के नंदीग्राम की पराजय को स्वीकार न करना था। हठवश मुख्यमंत्री पद पर बने रहकर उन्होंने जिस ‘अजेय’ छवि का ढोंग रचा, वह 2026 में ताश के पत्तों की तरह ढह गया। 4 मई के नतीजे केवल एक सरकार की विदाई नहीं, बल्कि बंगाल की ‘पुनर्स्थापना’ का शंखनाद हैं।

ममता ने अपने स्वभाव से जो ‘दुश्मन’ पैदा किए, आज उन्हीं की घेराबंदी ने उन्हें ‘कालीघाट’ से ‘निर्वासन’ की दहलीज पर ला खड़ा किया है।

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Author: fastblitz24

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