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जौनपुर का ‘नीला’ तड़का: हाथ को मिला ‘भीम’ का साथ, या ये है मजबूरी वाली बात?

आस्था या अस्तित्व की मजबूरी?

जौनपुर। 14 अप्रैल की सुबह जब जौनपुर की जनता सोकर उठी, तो शहर की गलियों और मुख्य मार्गों पर चस्पा नज़ारा देख हर कोई ठिठक गया। जो शहर कल तक तिरंगे के तीन रंगों और कांग्रेस के ‘हाथ’ के साथ नदीम जावेद की मुस्कुराहट देखने का आदी था, आज वहां का मंजर बदला-बदला था। संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती पर पूरा शहर नीले रंग के पोस्टरों से पटा पड़ा था, लेकिन आश्चर्य यह नहीं था कि पोस्टर लगे हैं, आश्चर्य यह था कि उन पोस्टरों में ‘पॉलिटिकल शोमैन’ कहे जाने वाले नदीम जावेद खुद नीली पोशाक में नजर आ रहे थे।

बदली रंगत, बदले समीकरण

​कांग्रेस के साथ दशकों की वफादारी निभाने वाले और पार्टी नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले नदीम जावेद का यह ‘नीला अवतार’ चर्चा का केंद्र बना हुआ है। नदीम जावेद उन नेताओं में शुमार रहे हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा, लेकिन इस बार उनके पोस्टरों से कांग्रेस का वह पारंपरिक कलेवर गायब दिखा। यह वही फेसबुक पेज है जहाँ कभी बाबा साहब की जयंती पर खामोशी पसरी रहती थी, जहाँ मुख्तार अंसारी की मौत पर तो संवेदनाएं व्यक्त की गईं, लेकिन अंबेडकर जयंती पर कभी ऐसी सक्रियता नहीं दिखी। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक नदीम जावेद को नीले रंग और बाबा साहब की शरण में जाने की जरूरत पड़ गई?

सियासी सफर: छात्र राजनीति से ‘पावर कॉरिडोर’ तक

​नदीम जावेद का राजनीतिक करियर किसी फ़िल्मी पटकथा से कम नहीं रहा है। 2005 में NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर दिल्ली की छात्र राजनीति में अपनी धमक जमाने वाले नदीम ने बेहद कम उम्र में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व (खासकर राहुल गांधी) का भरोसा जीत लिया था।

  • 21 साल का सूखा खत्म किया: 2012 के विधानसभा चुनाव में जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हाशिए पर थी, तब नदीम जावेद ने जौनपुर सदर सीट से 50,863 वोट पाकर जीत दर्ज की और कांग्रेस के 21 साल के ‘हार के सूखे’ को खत्म किया।
  • अल्पसंख्यक चेहरा: इसके बाद 2018 में उन्हें अखिल भारतीय अल्पसंख्यक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई।
  • चुनौतियां और हार: हालांकि, 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद उन्हें भाजपा के गिरीश चंद्र यादव से शिकस्त झेलनी पड़ी। तब से लेकर अब तक, जौनपुर की जमीन पर अपनी पकड़ बनाए रखना उनके लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।

क्या यह राजनीतिक मजबूरी है?

​जानकारों की मानें तो यह महज एक शुभकामना संदेश नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले की बिसात है। जौनपुर सदर की राजनीति इस समय बेहद दिलचस्प मोड़ पर है। एक तरफ नदीम जावेद हैं, जो इस सीट से दोबारा अपनी खोई हुई साख पाना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अमीक जामेई की बढ़ती सक्रियता ने समीकरण बदल दिए हैं। क्या गठबंधन की राजनीति में नदीम जावेद को यह डर सता रहा है कि उनकी जमीन खिसक रही है?

प्रतिद्वंद्वियों के साथ ‘पोस्टर’ तालमेल

​हैरानी की बात यह भी रही कि इन पोस्टरों में केवल रंग ही नहीं बदला, बल्कि पोस्टर पर पार्टी के प्रतिद्वंद्वी चेहरे भी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ बराबरी करते दिखे। यह नदीम जावेद की कोई ‘मास्टरस्ट्रोक’ वाली चाल है या फिर जौनपुर में बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की छटपटाहट?

सियासी पैंतरेबाज़ी या हृदय परिवर्तन?

​जौनपुर की जनता भली-भांति जानती है कि हर त्योहार पर होर्डिंग्स लगवाना नदीम जावेद की पुरानी कार्यशैली है। लेकिन ‘अंबेडकरवादियों’ के खास पहचान वाले नीले रंग को ओढ़कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना उनकी गहरी राजनीतिक पैंतरेबाज़ी की ओर इशारा करता है।

​क्या नदीम जावेद यह समझ चुके हैं कि सिर्फ अल्पसंख्यक वोटों के भरोसे जौनपुर की वैतरणी पार करना अब मुमकिन नहीं? या फिर यह समाजवादी पार्टी और दलित वोट बैंक को साधने का एक नया प्रयोग है? कारण जो भी हो, लेकिन जौनपुर की दीवारों पर बिखरा यह नीला रंग इस बात का गवाह है कि आने वाले समय में जिले की राजनीति में बड़े उलटफेर होने तय हैं। अब देखना यह है कि यह ‘नीला चोला’ उन्हें 2027 में सत्ता के गलियारे तक ले जाता है या फिर यह महज एक ‘पॉलिटिकल शो’ बनकर रह जाता है।

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Author: fastblitz24

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