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जौनपुर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल: लाख रुपये का इनामी ‘भोले’ रहा पुलिस की पहुंच से दूर, अब हाईकोर्ट से ले आया 60 दिनों का ‘कानूनी कवच’

जौनपुर
जिले की कानून-व्यवस्था और अपराधियों पर सख्त कार्रवाई के दावों के बीच जौनपुर पुलिस की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। जिस 1 लाख रुपये के इनामी आरोपी भोले राजभर को दबोचने के लिए पुलिस की टीमें महीनों से खाक छानने का दावा कर रही थीं, वह न सिर्फ पुलिस की गिरफ्त से दूर रहा, बल्कि अत्यंत सुनियोजित तरीके से इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचकर अपनी गिरफ्तारी पर 60 दिनों की अंतरिम रोक लगवाने में भी सफल रहा। पुलिस तंत्र की इस शिथिलता ने अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है।

​झकझोर देने वाली वारदात: आजाद बिन्द हत्याकांड से दहल उठा था इलाका

​          यह पूरा मामला खेतासराय थाना क्षेत्र का है, जहां घटित आजाद बिन्द दूल्हा हत्याकांड ने कानून-व्यवस्था को सीधी चुनौती दी थी। 2 मई को दर्ज हुई एफआईआर के मुताबिक, इस जघन्य हत्याकांड को बेहद बेखौफ अंदाज में अंजाम दिया गया था, जिसमें भोले राजभर मुख्य आरोपी बनकर उभरा। वारदात की संवेदनशीलता को देखते हुए शासन स्तर से आरोपी पर 1 लाख रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित किया गया। लेकिन विडंबना देखिए कि इतनी बड़ी राशि का इनाम घोषित होने और एसटीएफ व स्थानीय पुलिस की सक्रियता के दावों के बावजूद, आरोपी महीनों तक कानून की आंखों में धूल झोंकता रहा।

​पुलिस लकीर पीटती रही, आरोपी ने खटखटाया अदालत का दरवाजा

​जौनपुर पुलिस जब तक आरोपी की टोह लेने के पारंपरिक तरीकों में उलझी रही, तब तक आरोपी भोले राजभर ने कानूनी रास्ते का सहारा लेकर पुलिस की पूरी घेराबंदी को विफल कर दिया। उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर खुद को पूरी तरह निर्दोष बताया और एफआईआर निरस्त करने की मांग की।
​मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विवेक सारण की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। अदालत ने आरोपी की चालाकी को स्वीकार नहीं किया और साफ तौर पर कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला ऐसा नहीं है जिसे निरस्त किया जाए। कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की उसकी मांग को सिरे से खारिज कर दिया।

​60 दिनों की राहत: जौनपुर पुलिस के इकबाल को चुनौती!

​        भले ही माननीय उच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द करने से साफ इनकार कर दिया हो, लेकिन आरोपी के अनुरोध पर उसे 60 दिनों तक गिरफ्तारी से राहत प्रदान कर दी है। न्यायालय ने निर्देश दिया है कि इस तय अवधि के भीतर आरोपी को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में आत्मसमर्पण (Surrender) कर नियमित जमानत के लिए आवेदन करना होगा।
​भास्कर दृष्टिकोण: कोर्ट का यह आदेश विशुद्ध रूप से एक विधिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन जौनपुर पुलिस के खुफिया तंत्र और तत्परता के लिए यह निश्चित रूप से एक बड़ा झटका है। जो पुलिस अपराधी को सलाखों के पीछे भेजने का संकल्प दोहरा रही थी, वह अब विधिक बाध्यता के कारण 60 दिनों तक आरोपी को छू भी नहीं सकेगी।
​इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जिले में अपराधियों के हौसले पस्त करने का दावा करने वाली खाकी का सूचना तंत्र इस मामले में पूरी तरह विफल साबित हुआ। अब देखना यह है कि इस प्रशासनिक चूक और फजीहत के बाद क्या जौनपुर पुलिस अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करेगी, या फिर वह अगले दो महीनों तक आरोपी के स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करने का मूकदर्शक बनकर इंतजार करेगी?

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Author: fastblitz24

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