’नकली दवाओं’ और ‘बीमा घपले’ के बाद अब ‘महंगी दवाओं’ के सिंडिकेट पर सदन में कड़ा प्रहार

सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने शून्यकाल में उठाया साॅल्ट और कीमतों में भारी अंतर का मुद्दा
नर्सिंग होम पर आयुष्मान योजना के दुरुपयोग का आरोप, जन औषधि केंद्रों को बढ़ावा देने की मांग



नई दिल्ली:
देश के करोड़ों गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के स्वास्थ्य और जेब से जुड़े एक अति-महत्वपूर्ण विषय पर बुधवार को उच्च सदन (राज्यसभा) में तीखी गूँज सुनाई दी। सदन में यह मुद्दा तब और गरमा गया जब भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने दवाओं की कीमतों में व्याप्त भारी विसंगति को ‘आर्थिक शोषण’ करार दिया।
गौरतलब है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ सदन में एक बड़ी लामबंदी दिख रही है। हाल ही में आम आदमी पार्टी के सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने देश में फल-फूल रहे ‘नकली दवाओं’ (Spurious Drugs) के जानलेवा कारोबार पर सरकार को घेरा था, वहीं सांसद स्वाति मालीवाल ने स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में हो रहे बड़े ‘गड़बड़झाले’ और मरीजों के साथ होने वाली धोखाधड़ी को उजागर किया था। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अब डॉ. वाजपेयी ने ‘समान साॅल्ट-समान एमआरपी’ नीति लागू करने की पुरजोर मांग की है।
’काम साॅल्ट करता है, ब्रांड की कीमत नहीं’
शून्यकाल के दौरान डॉ. वाजपेयी ने तथ्यों के साथ सदन को अवगत कराया कि वर्तमान बाजार में नियमन की कमी के चलते एक ही साॅल्ट की दवा की कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर है। उन्होंने सवाल किया कि यदि साॅल्ट एक ही है, तो एक गोली 10 रुपये और दूसरी 50 रुपये की क्यों बेची जा रही है? उन्होंने स्पष्ट किया कि मरीज के शरीर पर साॅल्ट असर करता है, ब्रांड की महंगी कीमत नहीं। कीमतों में 50 से 500 रुपये तक का यह अंतर सीधे तौर पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई पर डाका डालने जैसा है।
आयुष्मान भारत योजना को ‘पलीता’ लगा रहे निजी अस्पताल
डॉ. वाजपेयी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘आयुष्मान भारत योजना’ और ‘जन औषधि केंद्रों’ की सराहना करते हुए एक गंभीर कड़वी सच्चाई भी उजागर की। उन्होंने आरोप लगाया कि आयुष्मान योजना के तहत सूचीबद्ध कई निजी अस्पताल और नर्सिंग होम सरकार की इस जनकल्याणकारी मंशा को पलीता लगा रहे हैं। अस्पताल प्रबंधक मरीजों को जन औषधि केंद्रों की सस्ती दवाइयों के बजाय महंगी ब्रांडेड दवाइयां लिखते हैं, ताकि बीमा राशि का बड़ा हिस्सा दवाइयों के बिलों के नाम पर वसूला जा सके।
30 सांसदों का समर्थन, नियमन की सख्त दरकार
अपनी मांग के समर्थन में डॉ. वाजपेयी ने केवल मौखिक पक्ष ही नहीं रखा, बल्कि विक्रमजीत सिंह साहनी सहित 30 अन्य सांसदों के हस्ताक्षर युक्त समर्थन पत्र भी सदन के पटल पर रखे। उन्होंने मांग की कि सरकार को अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए दवाओं की एमआरपी निर्धारित करने के लिए सख्त नियमन बनाना चाहिए ताकि कंपनियों की मनमानी पर पूर्णविराम लगे।
जनता की जरूरत: पारदर्शी और किफायती इलाज
विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि सरकार ‘एक साॅल्ट-एक कीमत’ की नीति लाती है, तो इससे स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में 40 से 60 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। डॉ. वाजपेयी, श्री साहनी और सुश्री मालीवाल द्वारा उठाए गए ये सामूहिक स्वर न केवल दवा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगाएंगे, बल्कि ‘Right to Health’ के संवैधानिक संकल्प को भी मजबूती प्रदान करेंगे।
FAST BLITZ विश्लेषण: डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का यह कदम स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता की एक नई बहस को जन्म देगा। यदि सरकार इस दिशा में कारगर कदम उठाती है, तो यह देश की स्वास्थ्य नीति में एक क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा, जिससे अंततः लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति को ही मिलेगा।
Author: fastblitz24



