अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज सही नाम-पता भी नहीं पिघला सका अपनों का दिल; बुआ जी अस्पताल के पास झाड़ियों में मिला था 38 साल का युवक
जौनपुर। खून का रिश्ता, चंद पन्नों का पारिवारिक विवाद और ढेर सारी नफरत… जब जिंदा रहते इंसान की कद्र खत्म होती है, तो लगता है कि शायद मौत के बाद दूरियां मिट जाएंगी। लेकिन जौनपुर का यह मामला इंसानियत और रिश्तों के मुंह पर करारा तमाचा है। यहाँ एक शख्स की मौत को 72 घंटे बीत चुके हैं, लेकिन उसका शव जिला अस्पताल के मोर्चरी हाउस में लावारिस पड़ा हुआ है। वजह बेहद खौफनाक है—वारिस मौजूद हैं, शहर में बड़ा नाम और रसूख भी है, लेकिन कोई अपनी ही औलाद/भाई का शव तक लेने नहीं आ रहा।
झाड़ियों में अचेत मिला था, अस्पताल में तोड़ा दम
घटना कोतवाली थाना क्षेत्र की है। मोहल्ला नक्खास निवासी अनिल कुमार गुप्ता (38 वर्ष), पिता स्व. रामचंदर गुप्ता, बीते 29 जुलाई को अहियापुर (धरनीधरपुर) में बुआ जी हॉस्पिटल के पास झाड़ियों में बदहवास हालत में पड़ा मिला था। एक स्थानीय राहगीर ने इंसानियत दिखाते हुए 108 एम्बुलेंस से उसे जिला अस्पताल पहुँचाया। जहाँ इलाज के दौरान 3 अगस्त (सोमवार) की सुबह करीब 11 बजे उसने अंतिम सांस ली।
सही नाम-पता लिखवाया, फिर भी अपनों तक नहीं पहुँची ‘मौत की खबर’
मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अनिल ने भर्ती होते समय अपना नाम और पता बिल्कुल सही दर्ज कराया था। इसके बावजूद तीन दिन तक परिजनों तक आधिकारिक सूचना न पहुँचना या पहुँचने के बाद भी उनका चुप रहना, पुलिस और प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ पारिवारिक संवेदनाओं की नाकामी पर बड़े सवाल खड़े करता है।
शहर के बड़े मिठाई व्यापारी से जुड़ा है परिवार
स्थानीय चर्चाओं और सूत्रों की मानें तो मृतक जौनपुर शहर के एक बेहद नामी और बड़े मिठाई विक्रेता के परिवार से ताल्लुक रखता है। धन-दौलत और रसूख से संपन्न इस परिवार की नफरत का आलम यह है कि इंसान की मौत के बाद भी उनका गुस्सा और शिकायतें खत्म नहीं हुईं।
जिंदा रहते देखभाल न करना एक अलग बात हो सकती है, लेकिन मरने के बाद एक अदद कफ़न और दो गज़ ज़मीन के लिए तरसाना इस बात का सबूत है कि आज के दौर में नफ़रत, खून के रिश्तों से कहीं ज्यादा भारी पड़ रही है। फिलहाल अनिल की लाश मोर्चरी में महज़ एक ‘केस नंबर’ बनकर अपनों के आने का इंतज़ार कर रही है।




