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हरदोई में ‘गुंडाराज’ की भेंट चढ़ी पत्रकारिता: क्या सरकारी स्कूल अब प्रधानाध्यापक की निजी जागीर हैं

 

उत्तर प्रदेश में जहां सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘महिला सुरक्षा’ का डंका पीट रही है, वहीं हरदोई जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को शर्मसार कर दिया है। मामला बेंदर ब्लॉक के हाफिज खेड़ा प्राथमिक विद्यालय का है, जहां विकास की हकीकत टटोलने पहुंची A2Z Voice (जन गण की आवाज़) की मुख्य पत्रकार ज़ैनब अक़िल खान के साथ न केवल बदसलूकी की गई, बल्कि उन्हें अकेले में देख लेने की धमकी देकर स्कूल से बाहर निकाला गया।

​क्या है पूरी घटना?

​एक पत्रकार का जुर्म सिर्फ इतना था कि वह यह जानना चाहती थी कि पिछले 5 सालों में करोड़ों के बजट वाले सरकारी स्कूल की सूरत कितनी बदली? लेकिन जैसे ही कैमरा ऑन हुआ, शिक्षा के मंदिर में बैठे ‘गुरु’ का असली चेहरा सामने आ गया। पहले बीमारी और BLO ड्यूटी का बहाना बनाया गया, और जब पत्रकार ने कुछ बोलना शुरू किया तो शुरू हुआ ‘सत्ता और रसूख’ का नंगा नाच!

प्रधानाध्यापक की ‘गुंडागर्दी’ कैमरे में हुयी कैद.”

हैरतअंगेज मोड़ तब आया जब विद्यालय के प्रधानाध्यापक पंकज मौके पर पहुंचे। उन्होंने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। एक महिला पत्रकार का हाथ पकड़कर धक्का-मुक्की करना, कैमरा तोड़ने की कोशिश करना और सरेआम धमकी देना कि— “तुम्हारी पत्रकारिता हम अकेले में निकालेंगे, देखते हैं तुम कितनी बड़ी पत्रकार हो”— क्या यह एक सरकारी कर्मचारी की भाषा है या किसी सड़क छाप गुंडे की?

​इतना ही नहीं, साहब का रसूख देखिए! उन्होंने न सिर्फ पत्रकार को, बल्कि अपने ही गाँव के उन ग्रामीणों को भी धक्के मारकर बाहर निकाला जिनके टैक्स से उनकी तनख्वाह आती है।

​सिस्टम की ‘पैरवी’ और सुलगते सवाल.”

​जब पीड़ित पत्रकार न्याय की गुहार लेकर थाने पहुंचीं, तो वहां भी खाकी का रवैया हैरान करने वाला था। मदद के बजाय ‘पैरवी’ का दबाव बनाया गया और सवाल पूछा गया कि— “अंदर जाने की परमिशन थी क्या?”

हालांकि देखा जाए तो सरकारी स्कूल एक सार्वजनिक संस्थान है, जहाँ जनता के टैक्स का पैसा लगता है। एक पत्रकार का काम और कर्तव्य जनहित में वहां की स्थिति का सच दिखाना है इसके लिए किसी “लिखित अनुमति” की अनिवार्य आवश्यकता नहीं होती, खासकर तब जब गेट खुला हो और बच्चे वहां मौजूद हों।

उच्चतम न्यायालय ने कई बार कहा है कि मीडिया का काम सत्ता और प्रशासन की जवाबदेही तय करना है। रिपोर्टिंग करना कोई “अनाधिकार प्रवेश” नहीं है जब तक कि वहां कोई आपराधिक मंशा न हो। इस गंभीर घटना ने जनता के बीच काफी बड़े सवाल कर दिए है और लोगों ने इस घटना को लेकर काफी आक्रोश नज़र आ रहा है

■क्या सरकारी स्कूल किसी की निजी जागीर है जहाँ जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछना मना है?

■सरकार के माडल विद्यालय बनाने के मिशन में फैल प्रिन्सिपल क्या इस तरह की गुंडागर्दी दिखाएंगे?

■एक पुरुष कर्मचारी को महिला पत्रकार का हाथ पकड़कर खींचने और धमकी देने का हक किसने दिया? क्या यूपी में महिला पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं?

■ करोड़ों के बजट के बाद भी हाफिज खेड़ा स्कूल में छात्र संख्या 10-15 तक क्यों सिमट गई है? क्या प्रधानाध्यापक का रसूख बच्चों के भविष्य से बड़ा है?

■ क्या ‘सत्ता पक्ष’ और ‘जाति’ का ढाल बनाकर ये दबंग कर्मचारी कानून से ऊपर हो गए हैं?

​ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। वे पूछ रहे हैं कि क्या जिलाधिकारी और बेसिक शिक्षा अधिकारी इस गुंडागर्दी का संज्ञान लेंगे? या फिर रसूखदार प्रधानाध्यापक के खिलाफ फाइल ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी? ज़ैनब अक़िल खान की यह रिपोर्ट सिर्फ एक स्कूल की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की पोल खोलती है जो सवाल पूछने वाली आवाजों को दबाना चाहता है। देखना यह है कि योगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति यहाँ कब अपनी ताकत दिखाती है।

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Author: fastblitz24

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