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मौत का ‘अवैध’ जंक्शन: जौनपुर में प्रसूता की जान के बाद क्या सचमुच जागेगा स्वास्थ्य विभाग?

अभियान’ की घोषणा या सिर्फ टालू मरहम?

विशेष रिपोर्ट

जौनपुर। मछलीशहर के इंद्रावती अस्पताल में एक ३० वर्षीय प्रसूता रेनू और उसके नवजात की मौत ने एक बार फिर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी है। कागजों पर सीज हो चुके अस्पताल और पुलिस को दी गई तहरीर के बीच, यह घटना केवल एक ‘चिकित्सकीय लापरवाही’ नहीं, बल्कि सीधे-सीधे प्रशासनिक शिथिलता का परिणाम है।

​जब तक कोई मां दम नहीं तोड़ देती, तब तक स्वास्थ्य विभाग की नींद क्यों नहीं टूटती? यह सवाल आज जौनपुर का हर नागरिक पूछ रहा है।

​’नो लाइसेंस, नो डॉक्टर’ फिर भी धड़ल्ले से चल रहा था सीजर ऑपरेशन

​अधीक्षक डॉ. अजय सिंह की जांच में जो बात सामने आई, वह दहला देने वाली है। जिस अस्पताल के पास सिजेरियन (सीजर) ऑपरेशन करने की अनुमति ही नहीं थी, वहां एक महिला के पेट पर सरेआम चाकू चला दिया गया।

    • कागजी खानापूर्ति: औचक निरीक्षण में अस्पताल में कोई डॉक्टर या वैध दस्तावेज नहीं मिले, सिर्फ दो स्टाफ नर्सों के भरोसे इतना बड़ा ‘डेथ ट्रैप’ चलाया जा रहा था।
    • रक्तस्राव और लापरवाही: ऑपरेशन के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग (रक्तस्राव) होना और फिर स्टाफ का भाग जाना यह साफ करता है कि वहां योग्य सर्जन मौजूद ही नहीं था।

बड़ा सवाल: क्या स्वास्थ्य विभाग को इस बात की भनक पहले से नहीं थी? मछलीशहर जैसे कस्बों में कुकुरमुत्ते की तरह उगे ये अवैध अस्पताल किसकी शह पर फल-फूल रहे हैं?

 

​पोस्टमार्टम न होना: क्या न्याय के रास्ते में आ गया सामाजिक दबाव?

​इस पूरे मामले का सबसे कमजोर और दुखद पहलू यह रहा कि मृतका के परिजनों ने बिना पोस्टमार्टम कराए ही शव का दाह संस्कार कर दिया। सीओ प्रतिमा वर्मा के मुताबिक, परिजनों ने कोई भी कानूनी कार्यवाही न करने की लिखित सहमति दी है।

​हालांकि, जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में अक्सर गरीब और पीड़ित परिवारों पर स्थानीय रसूखदारों या अस्पताल संचालकों द्वारा ‘मैनेजमेंट और समझौते’ का दबाव बनाया जाता है। पोस्टमार्टम न होने से अब इस मामले की फॉरेंसिक कड़ियां कमजोर हो सकती हैं, जिसका फायदा सीधे तौर पर आरोपी अस्पताल प्रबंधन को मिलेगा।

​’अभियान’ की घोषणा या सिर्फ टालू मरहम?

​घटना के बाद एडिशनल सीएमओ राजीव यादव और स्थानीय अधीक्षक ने क्षेत्र के सभी निजी अस्पतालों के खिलाफ ‘जांच अभियान’ चलाने की बात कही है। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे अभियान सिर्फ तभी चलते हैं जब कोई लाश सड़क पर आ जाती है।

विभाग की कार्रवाई

ज़मीनी हकीकत

अस्पताल को देर रात सीज किया गया।

आरोपी स्टाफ और डॉक्टर पहले ही फरार हो चुके हैं।

कोतवाली में प्राथमिकी के लिए तहरीर दी गई।

पीड़ित परिवार के पीछे हटने से केस कमजोर होने की आशंका।

अधोमानक (मानक विहीन) अस्पतालों पर जांच की घोषणा।

पूर्व में हुई सीलिंग की कार्रवाइयों के बाद भी अस्पताल फिर खुल जाते हैं।

अब सख्त रुख की जरूरत

​जौनपुर और उसके ग्रामीण इलाकों में ‘नॉर्मल डिलीवरी’ के नाम पर मरीजों को फंसाना और ऐन वक्त पर ‘सीजर’ का डर दिखाकर मोटी रकम वसूलना एक संगठित अपराध बन चुका है। रेनू और उसके बच्चे की मौत एक चेतावनी है।

​यदि स्वास्थ्य विभाग वाकई गंभीर है, तो उसे सिर्फ इंद्रावती अस्पताल को सीज करके शांत नहीं बैठना चाहिए। पंजीकरण के नियमों को ताक पर रखकर इंसानी जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले हर ‘क्लीनिक और नर्सिंग होम’ के मालिकों को जेल की सलाखों के पीछे भेजना होगा, तभी जिले में अगली किसी ‘रेनू’ की जान बचाई जा सकेगी।

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Author: fastblitz24

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