पत्रकार को धमकाने वाले दो पुलिस अधिकारियों को नोटिस
14 दिनों में जवाब न दिया तो भुगतना होगा अंजाम
जौनपुर।

सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरान और खाकी की हनक में चूर अफसरों को शायद यह भूलने की बीमारी हो गई थी कि लोकतंत्र की नींव पर चोट करना उन्हें भारी पड़ सकता है। जौनपुर के महाराजगंज थाने में दो वर्ष पहले एक निर्भीक पत्रकार को धमकाकर अपनी ‘तानाशाही’ साबित करने वाले तत्कालीन थानाध्यक्ष अश्विनी दूबे और उपनिरीक्षक एस.पी. पाण्डेय के अहंकार पर भारतीय प्रेस परिषद (PCI) ने ऐसा प्रहार किया है कि अब महकमे में सन्नाटा पसर गया है। पत्रकार पंकज कुमार के उत्पीड़न पर परिषद द्वारा जारी नोटिस (केस संख्या 157/2024/बीपीसीआई) ने स्पष्ट कर दिया है कि मीडिया का गला घोंटने की कोशिश करने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा।


क्या है भारतीय प्रेस परिषद
(एक नजर में)
प्रेस परिषद केवल कागजों पर काम करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह प्रेस की आजादी की रक्षा के लिए बना ‘संवैधानिक कवच’ है। ‘प्रेस परिषद अधिनियम, 1978’ के तहत गठित यह एक अर्ध-न्यायिक (Semi-Judicial) संस्था है।
- इसका स्वरूप: इसमें न्यायपालिका, पत्रकारिता और समाज के प्रबुद्ध वर्ग का प्रतिनिधित्व होता है।
- इसकी ताकत: इसे दीवानी न्यायालय (Civil Court) की शक्तियां प्राप्त हैं। यदि कोई अधिकारी पत्रकार को परेशान करता है, तो परिषद धारा 13(1) और 15(4) के तहत उन्हें समन जारी कर तलब करने का पूर्ण अधिकार रखती है।
क्यों मची है हलचल? परिषद का ‘चाबुक’ और संभावित परिणाम
अक्सर लोग इसे ‘बिना दांतों का शेर’ कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जब प्रेस परिषद का चाबुक चलता है, तो अधिकारी का सर्विस रिकॉर्ड और उसका कॅरियर तक दांव पर लग जाता है। जौनपुर मामले में परिषद की यह आक्रामक कार्यवाही उन तमाम अफसरों के लिए एक सबक है जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं।
अगर इन अधिकारियों ने 14 दिनों में संतोषजनक जवाब नहीं दिया, तो क्या होगा?
- सीधी जांच: यह मामला परिषद की जांच समिति के पास जाएगा, जहां इन अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अपनी सफाई पेश करनी पड़ सकती है।
- सख्त भर्त्सना (Censure): परिषद न केवल दोषी अधिकारियों की सार्वजनिक निंदा करेगी, बल्कि उनकी रिपोर्ट राज्य सरकार के गृह विभाग को भेजेगी, जिससे उन पर विभागीय दंडात्मक कार्रवाई (Departmental Action) की तलवार लटक जाएगी।
- कदाचार की मुहर: प्रेस परिषद की टिप्पणी किसी भी अधिकारी के प्रमोशन और करियर के लिए ‘ब्लैक मार्क’ साबित होती है।
चौथे स्तंभ पर प्रहार: अब ‘आर-पार’ की जंग
आज जब न्यायपालिका और राजनीति के दबाव में मीडिया का एक वर्ग अपनी धार खो रहा है, तब प्रेस परिषद का यह स्टैंड निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए संजीवनी की तरह है। पत्रकार पंकज कुमार की शिकायत पर परिषद ने जिस तरह से इस मामले को ‘स्वतंत्रता पर कुठाराघात’ माना है, वह इस बात का सबूत है कि अभी भी लोकतंत्र की रक्षक संस्थाएं पूरी तरह पंगु नहीं हुई हैं।
महाराजगंज क्षेत्र की पुलिस अब बैकफुट पर है। कल तक जो वर्दीधारी पत्रकार को डराकर उसे ‘दबाने’ का ख्वाब देख रहे थे, आज वे खुद कानून के कटघरे में खड़े हैं। जौनपुर के पत्रकार संगठनों ने इसे जीत की पहली सीढ़ी करार देते हुए हुंकार भरी है— “यह लड़ाई सिर्फ एक पत्रकार की नहीं, बल्कि कलम की आजादी को कुचलने वाली उस मानसिकता के खिलाफ है, जो लोकतंत्र को अपनी जागीर समझती है।”
यह कार्रवाई महज एक नोटिस नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने का प्रयास है। देखना यह है कि क्या जौनपुर पुलिस इस संवैधानिक नोटिस का सम्मान करती है या अपनी पुरानी आदतों के चलते स्वयं को और गहरे दलदल में धकेलती है।
Author: fastblitz24


