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180 दिन का पैंतरा फेल!
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90 दिन में चार्जशीट दाखिल न करने पर शिवम द्विवेदी को मिली राहत;
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जानिए अदालत ने पुलिस की दलीलों को किया कैसे खारिज

(विधि संवाददाता)
प्रयागराज, 24 जुलाई 2026
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि बिना किसी वाणिज्यिक मात्रा (commercial quantity) के नशीले पदार्थों या केवल कफ सिरप की जब्ती वाले मामलों में एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम की सख्त 180 दिनों की आरोप-पत्र (charge-sheet) दाखिल करने की अवधि लागू नहीं होगी। ऐसी स्थितियों में सामान्य 90 दिनों की समयावधि ही लागू होगी और इसका उल्लंघन होने पर आरोपी डिफ़ॉल्ट जमानत (default bail) का हकदार है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने शिवम द्विवेदी द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition – No. 739/2026) पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और समान राशि की दो जमानतदारों पर अंतरिम जमानत देने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता शिवम द्विवेदी को 24 दिसंबर 2025 को मिर्जापुर जिले के अदलहाट पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी (F.I.R. No. 376/2025) के तहत गिरफ्तार किया गया था। याचिकाकर्ता के वकील अमरनाथ त्रिपाठी ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल न किए जाने के बावजूद जेल में रखा गया था।
निचली अदालत (विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, मिर्जापुर) ने 21 अप्रैल 2026 को इस आधार पर डिफ़ॉल्ट जमानत खारिज कर दी थी कि NDPS अधिनियम की धारा 36A(4) के तहत जांच और आरोप-पत्र के लिए 180 दिनों की समयावधि उपलब्ध है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया, क्योंकि पुलिस ने 16 जून 2026 को चार्जशीट दाखिल की थी—जो कि 90 दिनों की वैधानिक सीमा बीतने के काफी बाद थी।
उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां:
- धाराओं का अवलोकन: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता पर NDPS अधिनियम की केवल धारा 29, 26(d), 8(c) और 21(c) के तहत आरोप लगाए गए हैं। मामला वाणिज्यिक मात्रा के प्रतिबंधित पदार्थों के सीधे कब्जे से संबंधित नहीं था।
- पूर्व न्यायिक मिसालों का हवाला: याचिकाकर्ता के वकील ने विभोर राणा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2022) तथा पटना उच्च न्यायालय के संजय बनाम बिहार राज्य फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें कहा गया है कि फेंसेडिल (Phensedyl/Codeine) कफ सिरप मुख्य रूप से शेड्यूल ‘H’ दवा के अंतर्गत आता है और इस पर NDPS की कठोर धाराएं सीधे लागू नहीं होतीं।
- डिफ़ॉल्ट जमानत का मौलिक अधिकार: पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों (संजय दत्त बनाम राज्य, उदय मोहनलाल आचार्य, राकेश कुमार पॉल और एस. कासी) का हवाला देते हुए दोहराया कि निर्धारित अवधि में चार्जशीट दाखिल न होने पर डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार एक अपरिहार्य (indefeasible) अधिकार बन जाता है।
न्यायालय का अंतरिम आदेश
पीठ ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी करते हुए कहा:
“प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता पर NDPS अधिनियम का सीधा आरोप उचित नहीं है। इसलिए आरोप-पत्र दाखिल करने के लिए धारा 167(2) Cr.P.C. के तहत 90 दिनों की अवधि ही लागू होगी, न कि 180 दिनों की, जैसा कि जमानत खारिज करने वाली अदालत ने माना था।”
उच्च न्यायालय ने राज्य के अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) को तीन सप्ताह का समय देते हुए पूरक हलफनामा (supplementary counter-affidavit) दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या याचिकाकर्ता पर NDPS एक्ट की धाराएं लगाना तर्कसंगत है या नहीं।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 07 सितंबर 2026 तय की है और तब तक याचिकाकर्ता को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी किया है।





