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इस्लामाबाद वार्ता फुस्स: क्या पाकिस्तान की ‘कमजोरी’ और ‘गैर-जिम्मेदाराना’ रवैये ने डुबोई लुटिया?

 

अमेरिका-ईरान के बीच ‘वेटर’ बनकर रह गया इस्लामाबाद, मध्यस्थता में पूरी तरह नाकाम; घरेलू संकट बना बड़ी बाधा

 

इस्लामाबाद वार्ता की नाकामी—ट्रंप की कूटनीतिक बिसात या वेंस की ‘राजनीतिक बलि’?

       पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के सेरेना होटल में 21 घंटे तक चला कूटनीतिक नाटक आखिरकार बिना किसी नतीजे के खत्म हो गया। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस मेज थपथपाकर खाली हाथ वाशिंगटन लौट गए। लेकिन क्या यह वार्ता वास्तव में शांति के लिए थी? या फिर यह डोनाल्ड ट्रंप की वह सोची-समझी बिसात थी, जिसमें उन्होंने एक साथ दो मोर्चों पर फतह हासिल करने की कोशिश की है?

​          जेडी वेंस: ‘शांति दूत’ या ट्रंप का मोहरा?


​इस पूरी वार्ता में सबसे दिलचस्प मोड़ जेडी वेंस का नेतृत्व था। ट्रंप ने अपने दामाद जैरेड कुशनर और दोस्त स्टीव विटकॉफ को पीछे धकेलकर वेंस को आगे किया। इसके पीछे ट्रंप की ‘दोहरी मार’ साफ दिखाई देती है:
​ईरान को लुभाना:
       ईरान को कुशनर पर भरोसा नहीं था। ट्रंप ने वेंस को भेजकर, जिन्हें युद्ध-विरोधी माना जाता है, यह संदेश दिया कि वे शांति के प्रति गंभीर हैं।
​विरोधियों का अंत:
        जेडी वेंस ट्रंप की आक्रामक नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं। इस विफल वार्ता के जरिए ट्रंप ने अपने इस संभावित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की छवि को ‘नाकाम वार्ताकार’ के रूप में स्थापित कर दिया। जैसा कि खुद ट्रंप ने मजाक में कहा था— “हार का ठीकरा वेंस पर और जीत का सेहरा मेरे सिर।”

​ईरान का अड़ियल रुख: ईरानी वार्ताकारों पर फौज और कट्टरपंथियों का दबाव

​        वार्ता की असफलता का एक बड़ा कारण ईरानी प्रतिनिधिमंडल का स्वरूप भी था। यह शुद्ध रूप से कूटनीतिक दल नहीं था। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कलिबाफ के नेतृत्व वाले इस दल पर ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और कट्टरपंथी लड़ाकों का भारी दबाव था। ईरान किसी भी ऐसी शर्त को मानने को तैयार नहीं था जो उसकी सैन्य शक्ति या क्षेत्रीय प्रभाव को कम करती हो। उनके लिए यह वार्ता समाधान से ज्यादा अपने घरेलू एजेंडे को सेट करने का जरिया थी।

​ पाकिस्तान: मध्यस्थ या महज एक ‘वेटर’?

​      इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में रही। खुद को ‘मिडिएटर’ कहने वाला पाकिस्तान वास्तव में केवल एक ‘वेटर’ की भूमिका में नजर आया, जो केवल मेज सजाने और चाय परोसने तक सीमित था। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान की साख इतनी कम हो चुकी है कि वह दो शक्तिशाली देशों के बीच ‘फासला कम’ करने की स्थिति में ही नहीं था। वह केवल ट्रंप के इशारों पर एक मंच मुहैया करा रहा था।

​होर्मुज की नाकेबंदी और भविष्य का संकट

​  वार्ता विफल होते ही ट्रंप ने ‘होर्मुज स्ट्रेट’ की नाकेबंदी की धमकी देकर अपने असली इरादे साफ कर दिए हैं। शांति की आड़ में अमेरिका ने युद्ध की नई जमीन तैयार कर ली है। जेडी वेंस की नाकामी अब ट्रंप को और अधिक आक्रामक होने का ‘नैतिक कवर’ प्रदान करेगी।
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यह वार्ता कभी सफल होने के लिए बनी ही नहीं थी। यह कूटनीतिक बिसात केवल समय काटने और अपनी-अपनी घरेलू राजनीति को साधने के लिए बिछाई गई थी। ट्रंप ने अपनी चाल चल दी है, वेंस की राजनीतिक साख दांव पर लगा दी है और ईरान ने अपनी कट्टरता का परिचय दे दिया है। अब दुनिया को एक नए और भीषण संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए।
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Author: fastblitz24

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