लखनऊ की ‘उपेक्षा’ या जौनपुरिया नेताओं की ‘नाकामी’?
प्रदेश टीम से जौनपुर का पत्ता पूरी तरह साफ!
दिल्ली-लखनऊ में रसूख का दावा, लेकिन प्रदेश टीम में जौनपुर ‘शून्य’; क्या केवल पुराने चेहरों के भरोसे कटेगी वैतरणी?
जौनपुर।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उत्तर प्रदेश के नए सांगठनिक ढांचे की बहुप्रतीक्षित घोषणा ने जौनपुर के स्थानीय सियासी गलियारों में एक अजीब सी खामोशी और असंतोष की लहर पैदा कर दी है। प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी द्वारा जारी की गई नई टीम की सूची में प्रदेश पदाधिकारियों से लेकर मोर्चा प्रकोष्ठों और मीडिया प्रभारियों तक के नाम शामिल हैं, लेकिन इस पूरी कवायद में जौनपुर के हिस्से सिर्फ ‘इंतजार’ और ‘उपेक्षा’ आई है। लखनऊ की इस नई बिसात पर जौनपुर के किसी भी नए चेहरे को प्रदेश पदाधिकारी के रूप में जगह न मिलना जिले के उन तमाम दिग्गजों के गाल पर तमाचा है, जो हफ्तों से राजधानी में पैरवी और परिक्रमा में जुटे थे।


दो संगठनात्मक जिलों का भार, पर नए प्रतिनिधित्व पर पूर्ण विराम
भौगोलिक और राजनीतिक रूप से जौनपुर को दो सांगठनिक जिलों—जौनपुर जिला संगठन और मछलीशहर जिला संगठन—में बांटा गया है। इसके बावजूद, कल घोषित हुई प्रदेश पदाधिकारियों की मुख्य सूची में जिले का प्रतिनिधित्व पूरी तरह शून्य रहा।
वर्तमान में जिले की साख केवल उन पुराने चेहरों के भरोसे टिकी है, जिन्हें तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के कार्यकाल में ‘प्रदेश कार्यसमिति सदस्य’ बनाया गया था और जिन्हें वर्तमान अध्यक्ष ने फिलहाल बरकरार रखा है। इनमें शामिल हैं:
- सीमा द्विवेदी (सांसद)
- गिरीश चंद्र यादव (राज्य मंत्री)
- डॉ. के. पी. सिंह (पूर्व सांसद)
- ब्रह्मदेव मिश्रा व सुशील उपाध्याय (पूर्व जिला अध्यक्ष)
- राजेश श्रीवास्तव ‘बच्चा भैया’ एडवोकेट (वरिष्ठ नेता)
- अनीता रावत (पूर्व विधानसभा प्रत्याशी)
- अनीता सिद्धार्थ (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष)
इसके अलावा कुछ ऐसे नेता भी हैं जो जौनपुर से ताल्लुक रखते हैं लेकिन लखनऊ कोटे से कार्यसमिति में एडजस्ट हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या जौनपुर जैसी राजनीतिक रूप से उर्वर भूमि के पास नए नेतृत्व का अकाल पड़ गया है?
भविष्य के गर्त में कार्यसमिति: पुरानी सूची बचेगी या कटेगा टिकट?
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात को लेकर तीखी चर्चाएं हैं कि कल सिर्फ प्रदेश पदाधिकारियों की सूची ही क्यों आई? प्रदेश कार्यसमिति सदस्यों की सूची को अभी रोक कर रखा गया है। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि क्या भूपेंद्र सिंह चौधरी स्वतंत्र देव सिंह की पुरानी कार्यसमिति को ही ढोते रहेंगे या फिर इसमें भी बड़ा फेरबदल कर जौनपुर के पुराने दिग्गजों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा? यह अनिश्चितता जिले के वर्तमान कार्यसमिति सदस्यों की धड़कनें बढ़ाने वाली है।
पैरवी और परिक्रमा फेल: जौनपुर के ‘लॉबिंग वीरों’ को लगा तगड़ा झटका
इस सूची के आने से पहले जौनपुर और मछलीशहर दोनों ही सांगठनिक जिलों के दर्जनों वरिष्ठ नेता और पूर्व पदाधिकारी लखनऊ में डेरा डाले हुए थे। जातिगत समीकरणों से लेकर निष्ठा तक के दावे किए जा रहे थे। लेकिन जब कल सूची सार्वजनिक हुई, तो जौनपुर के इन ‘लॉबिंग वीरों’ के हाथ पूरी तरह खाली रहे।
फ़ास्ट ब्लिट्ज 24 दृष्टिकोण: जौनपुर ने हमेशा उत्तर प्रदेश की राजनीति को दिशा दी है। ऐसे में प्रदेश संगठन की मुख्य टीम में जिले को पूरी तरह नजरअंदाज करना न केवल स्थानीय कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने वाला है, बल्कि आगामी चुनावों के मद्देनजर भाजपा की रणनीतिक चूक को भी दर्शाता है। क्या पार्टी केवल मंत्रियों और सांसदों के पुराने रसूख के सहारे जौनपुर फतह करने का भ्रम पाले हुए है?
Author: fastblitz24

