Fastblitz 24

ओबीसी व्यक्ति से पैर धुलवाने के केस से अलग हुए हाईकोर्ट के दो जज

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के दो न्यायाधीशों ने मंगलवार 28 अक्टूबर को अन्य पिछड़ा वर्ग ओबीसी समुदाय के एक युवक को कथित तौर पर एक व्यक्ति के पैर धुलवाने और पानी पीने के लिए मजबूर करने के मामले में सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।

ज्ञात हो कि इस महीने के शुरूआत में मध्य प्रदेश के दमोह जिले में अन्य पिछड़ा वर्ग ओबीसी के एक युवक को कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया था। आरोप था कि एक व्यक्ति की आपत्तिजनक एआई.एडिटेड तस्वीर शेयर करने पर उसे उसके पैर धुलवाकर पानी पीने के लिए मजबूर किया। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था।

पीड़ित की पहचान पुरुषोत्तम कुशवाहा के रूप में हुई थी। उन्हें अनुज पांडे के पैर धोने के लिए मजबूर किया गया ताकि वह जूते की माला पहने हुए अपनी एआई.एडिटेड तस्वीर शेयर करने के लिए माफ़ी मांगे।

कुशवाहा का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसमें वह स्थानीय लोगों से घिरे हुए और एक व्यक्ति के पैर धोते हुए दिख रहे थे। वीडियो में कुशवाहा को यह कहते हुए सुना जा सकता है। मैं ब्राह्मण समुदाय से माफ़ी मांगता हूं। ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। हम ब्राह्मणों की इसी तरह पूजा करते रहेंगे।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की पीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया और आदेश दिया कि मामले को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रखा जाए। इस कदम के पीछे न्यायाधीशों ने कहा कि जिन मामलों की सुनवाई शुरू में जस्टिस अतुल श्रीधरन की पीठ कर रही थी। अब वे मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा निपटाए जा रहे हैं।

इस महीने की शुरुआत में जस्टिस श्रीधरन का मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादला कर दिया गया था। केंद्र सरकार द्वारा पुनर्विचार के अनुरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने श्रीधरन का छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के बजाय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरण करने की सिफारिश की थी।

इससे पहले जस्टिस श्रीधरन की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने मीडिया में आई ख़बरों के आधार पर पांव धुलवाए जाने की घटना का स्वतः संज्ञान लिया था और मामले की सुनवाई की थी। पीठ ने दमोह पुलिस और प्रशासन को आरोपियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए लगाने का निर्देश दिया था। इसके बाद पांच लोगों पर एनएसए के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के अनुसार जस्टिस श्रीधरन को शिफ्ट करने के सरकार के अनुरोध को सार्वजनिक रूप से दर्ज करने का सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का निर्णय अभूतपूर्व है। हालांकि, कॉलेजियम के प्रस्ताव में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था कि पुनर्विचार का अनुरोध क्यों किया गया। उल्लेखनीय है कि जम्मू.कश्मीर में अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस श्रीधरन की पीठ ने जन सुरक्षा अधिनियम के तहत कई निवारक निरोध आदेशों को रद्द कर दिया था।

fastblitz24
Author: fastblitz24

Spread the love

यह भी पढ़ें

टॉप स्टोरीज