चांदा (सुल्तानपुर)। नगर पंचायत कोइरीपुर में सोमवार को आयोजित पारंपरिक दंगल प्रतियोगिता में पहलवानों ने तो खूब दमखम दिखाया, लेकिन आयोजन स्थल पर फैली बदइंतजामी ने व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। दंगल देखने के लिए उमड़ी हजारों की भीड़ के लिए न बैठने की जगह थी, न पीने का पानी और न ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम। पूरा आयोजन घंटों तक ‘राम भरोसे’ चलता रहा, जिससे दर्शकों की जान हर पल जोखिम में दिखी।

बैरिकेडिंग पर लटके रहे दर्शक, अफरा-तफरी का डर


दंगल का रोमांच ऐसा था कि भीड़ अखाड़े की क्षमता से कहीं ज्यादा पहुंच गई। हालात यह थे कि जगह न मिलने पर दर्शक बैरिकेडिंग, दीवारों और ऊंची छतों पर चढ़कर मुकाबले देखने को मजबूर हुए। भीड़ का सैलाब इतना था कि यदि थोड़ी सी भी अफरा-तफरी मचती, तो बड़ा हादसा हो सकता था। मौके पर मौजूद पुलिस बल भी भीड़ के दबाव के सामने बेबस नजर आया। संवेदनशील स्थानों पर न तो निगरानी के पुख्ता बंदोबस्त थे और न ही भीड़ को नियंत्रित करने का कोई ठोस खाका।
बूंद-बूंद पानी के लिए तरसे लोग
भीषण गर्मी में दंगल देखने पहुंचे हजारों दर्शकों की सुध लेने वाला कोई नहीं था। प्यास बुझाने के लिए पेयजल तक की व्यवस्था नहीं की गई थी, जिसके चलते लोग दुकानों पर पानी के लिए भटकते रहे। वहीं, आयोजन में सबसे अहम मानी जाने वाली प्राथमिक उपचार (फर्स्ट एड) की सुविधा भी नदारद रही। गर्मी के कारण कई बुजुर्गों और बच्चों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
‘किस्मत अच्छी थी जो टल गया हादसा’
स्थानीय लोगों का कहना है कि दंगल क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान है, लेकिन आयोजकों की जिम्मेदारी सिर्फ मंच सजाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक जागरूक नागरिक ने कहा, “इस बार तो किस्मत अच्छी थी कि आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया, लेकिन ऐसी लापरवाही किसी बड़े हादसे को न्यौता देने के समान है।”
आयोजकों की अनदेखी पर सवाल:
हजारों की संख्या में दर्शकों के जुटने की उम्मीद पहले से थी, फिर भी सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव यह बताने के लिए काफी है कि आयोजकों ने इसे कितनी गंभीरता से लिया। अब सवाल उठ रहा है कि क्या सिर्फ आयोजन करा लेना ही प्रशासन और आयोजकों की जिम्मेदारी है? भविष्य में अगर ऐसी लापरवाही दोहराई गई, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
Author: fastblitz24

