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पूर्वांचल का ‘किंगमेकर’ होने की दावेदारी: राजभर के 83 सीटों वाले फॉर्मूले का ‘ऑपरेशन’

    • गठबंधन की बिसात पर पहला पासा: क्या SBSP का दावा महज दबाव बनाने की रणनीति है?
    • आंकड़ों की आईने में हकीकत: 2017 से 2022 तक के चुनावी सफर की पड़ताल।
    • किंग या किंगमेकर: अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की जद्दोजहद।
    • सीटों के बंटवारे का गणित: 83 में से 63 सीटों का दावा, कितना है दम?

जौनपुर/वाराणसी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्वांचल का रास्ता लखनऊ की सत्ता की चाबी माना जाता है। इसी चाबी को अपने हाथ में होने का दावा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के राष्ट्रीय प्रमुख महासचिव अरविंद राजभर ने एक बार फिर दोहराया है। जौनपुर में दिए गए उनके बयान ने सियासी गलियारों में यह चर्चा छेड़ दी है कि क्या SBSP सच में किंगमेकर है या महज गठबंधन की राजनीति का एक मोहरा?

83 सीटों का वह ‘जादुई’ समीकरण

​अरविंद राजभर का दावा है कि पूर्वांचल की 83 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहाँ उनकी पार्टी की मर्जी ही हार-जीत तय करती है। उनका तर्क है कि 2017 में जब SBSP भाजपा के साथ थी, तो ये सीटें भगवा खेमे में गईं और 2022 में सपा के साथ आते ही ये सीटें ‘लाल’ हो गईं। अब एनडीए में शामिल होकर राजभर उन्हीं सीटों पर फिर से परचम लहराने की बात कर रहे हैं।

आंकड़ों की जुबानी: 2017 बनाम 2022

​सच्चाई परखने के लिए हमें पिछले दो चुनावों के नतीजों का विश्लेषण करना होगा। नीचे दी गई तालिका इन 83 सीटों के मिजाज को समझने में मदद करती है:

चुनाव वर्ष

गठबंधन

मिली सीटों की संख्या (अनुमानित प्रभाव क्षेत्र)

2017

NDA (भाजपा + SBSP)

~70-75 सीटें

2022

PDA/सपा गठबंधन (सपा + SBSP)

~50-55 सीटें

(नोट: आंकड़े उन सीटों पर आधारित हैं जहाँ SBSP का प्रभाव रहा है, इसमें अन्य सहयोगियों की भूमिका भी शामिल है।)

तर्क और असलियत का ऑपरेशन

​अरविंद राजभर का दावा आत्मविश्वास से लबरेज जरूर है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

  1. उत्प्रेरक बनाम निर्णायक: राजभर वोट बैंक पूर्वांचल में एक ‘बार्गेनिंग पावर’ है, जो किसी भी गठबंधन को बढ़त दिला सकता है। लेकिन यह मानना कि अकेले SBSP के दम पर ये सीटें जीती गईं, चुनावी गणित के साथ नाइंसाफी है। इसमें भाजपा का संगठनात्मक ढांचा या सपा का सामाजिक समीकरण भी अहम था।
  2. सीटों का बंटवारा और सौदेबाजी: राजभर का यह कहना कि वे 83 में से 63 सीटों पर तैयारी कर रहे हैं, असल में आगामी सीट बंटवारे (Seat Sharing) का एक प्रेशर टैक्टिस (दबाव की रणनीति) है। एनडीए में खुद को मजबूत दिखाने और अधिक सीटें झटकने के लिए यह एक सोची-समझी चाल है।
  3. ‘किंग’ नहीं ‘किंगमेकर’ की रणनीति: अरविंद राजभर का यह स्वीकार करना कि “हम किंग नहीं बन सकते, पर किंगमेकर हैं”, उनकी पार्टी की सीमा और महत्वाकांक्षा दोनों को दर्शाता है। वे जानते हैं कि अपना मुख्यमंत्री बनाने की ताकत उनके पास नहीं है, इसलिए वे किसी बड़े दल के साथ जुड़कर अपनी सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते हैं।

         अरविंद राजभर का यह बयान कि वे “किंगमेकर” हैं, राजनीतिक यथार्थवाद और रणनीतिक आत्मविश्वास का मिश्रण है। उनकी पार्टी उन 83 सीटों के ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ को अपनी ढाल बनाकर अपनी सौदेबाजी को मजबूत कर रही है। हालांकि, यह दावा अगले चुनाव में तभी मान्य होगा जब गठबंधन के भीतर उन्हें सम्मानजनक सीटें मिलेंगी और सबसे महत्वपूर्ण—वे इन सीटों पर अपने गठबंधन सहयोगियों को जीत दिलाने में सफल रहेंगे।

​पूर्वांचल की राजनीति में ‘किंगमेकर’ बने रहने का SBSP का यह प्रयास निश्चित रूप से आगामी विधानसभा चुनाव में गठबंधन की रणनीतियों को प्रभावित करेगा। लेकिन अंततः, किंगमेकर का ताज जनता के मतों और गठबंधन के भीतर उनके समन्वय पर ही निर्भर करेगा।

क्या कहता है भविष्य?

​खुल्लम-खुल्ला बयानबाजी कर राजभर ने एनडीए की बिसात पर अपना पासा फेंक दिया है। वे अपनी धमक दिखाना चाहते हैं ताकि जब गठबंधन में बैठकों का दौर शुरू हो, तो एनडीए नेतृत्व उनकी शर्तों को मानने के लिए मजबूर हो।

       अरविंद राजभर के दावे राजनीति के ‘अंकगणित’ पर आधारित हैं। 83 सीटों का उनका दावा भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगा या सिरदर्द, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे। लेकिन एक बात तय है—पूर्वांचल के 28 जिलों की इन सीटों पर अब हर दल की नजर है। राजभर खुद को किंगमेकर साबित कर पाते हैं या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा, लेकिन फिलहाल तो वे पूर्वांचल की राजनीति में ‘चर्चा का केंद्र’ जरूर बने हुए हैं।

 

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Author: fastblitz24

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