अराजक तत्वों की कायराना करतूत: डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा पर पहनाई खाकी टोपी व भगवा गमछा, लोगों में फूटा भारी आक्रोश

जौनपुर ( संवाददाता)। शहर के सबसे व्यस्ततम इलाकों में से एक दीवानी तिराहे पर स्थापित भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के साथ एक बार फिर अराजक तत्वों द्वारा छेड़छाड़ किए जाने का निंदनीय मामला सामने आया है। सोमवार सुबह जब स्थानीय लोगों ने बाबा साहेब की प्रतिमा पर खाकी टोपी और गले में भगवा गमछा देखा, तो देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में तनाव फैल गया। बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए विरोध दर्ज कराया।


घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए सिटी मजिस्ट्रेट और क्षेत्राधिकारी (सीओ) नगर भारी पुलिस बल के साथ तुरंत मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने सूझबूझ का परिचय देते हुए तत्काल प्रतिमा से टोपी और गमछा हटवाया। आक्रोशित लोगों को शांत कराते हुए पुलिस ने उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया, जिसके बाद माहौल काबू में आया।
पूर्व में भी हो चुकी है ऐसी ओछी हरकत
स्थानीय लोगों का गुस्सा इस बात पर ज्यादा है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व भी इसी प्रतिमा पर अराजक तत्वों द्वारा कालिख पोतने की घिनौनी वारदात को अंजाम दिया जा चुका है, जिसके बाद तत्कालीन जिलाधिकारी दिनेश चंद्र सिंह को स्वयं मौके पर पहुंचकर प्रतिमा की सफाई करनी पड़ी थी। बार-बार हो रही इन घटनाओं से स्थानीय प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सीसीटीवी में कैद हुआ आरोपी
”तिराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले गए हैं, जिसमें एक अराजक तत्व की संदिग्ध गतिविधि कैद हुई है। आरोपी की पहचान की जा रही है और जल्द ही उसे गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा जाएगा। क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम है।”
— सीओ सिटी, जौनपुर
Fast blitz दृष्टिकोण: महापुरुषों को रंगों और प्रतीकों के चश्मे से देखना बंद करे समाज
जौनपुर में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के साथ हुई यह हरकत न केवल अति निंदनीय है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की एक गहरी साजिश भी है। लोकतंत्र और संविधान के निर्माता बाबा साहेब किसी एक वर्ग, दल या विचारधारा के नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के गौरव हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आज के दौर में महापुरुषों को भी रंगों, डिज़ाइनों और विशिष्ट प्रतीकों के संकीर्ण चश्मे से देखने की होड़ मची हुई है। खाकी या भगवा जैसे प्रतीकों को राजनीतिक और वैचारिक द्वेष का हथियार बनाकर महापुरुषों की प्रतिमाओं पर थोपना मानसिक दिवालियेपन को दर्शाता है।
ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर समाज को भड़काने वाले अराजक तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए, लेकिन इसके साथ ही आम जनता को भी परिपक्वता दिखानी होगी। ऐसी हरकतों के पीछे छिपे विवाद खड़े करने के मंसूबों को नाकाम करने के लिए इन्हें ‘नजरअंदाज’ करने और शांति बनाए रखने की भी महती आवश्यकता है। जब तक हम महापुरुषों को दलगत और रंगत की राजनीति से ऊपर उठाकर केवल उनके विचारों से नहीं जोड़ेंगे, तब तक समाज में ऐसी कुत्सित मानसिकता पनपती रहेगी।
Author: fastblitz24


