स्पेशल रिपोर्ट
आगरा/लखनऊ
(प्रदेश ब्यूरो)
नकली, नशीली और प्रतिबंधित दवाओं के काले कारोबार के खिलाफ औषधि विभाग और एसटीएफ (STF) के बड़े-बड़े दावों पर सवालिया निशान लग गया है। करोड़ों रुपये की दवाओं की जब्ती, गोदामों की सीलिंग और कई आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद जब केंद्रीय प्रयोगशाला (Central Laboratory) से रिपोर्ट आती है, तो पूरा मामला उलट जाता है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि विभाग और फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधियों द्वारा प्रथम दृष्टया ‘नकली’ बताई गई दवाएं लैब टेस्ट में ‘असली’ निकल रही हैं।
इसी प्रशासनिक चूक या संदिग्ध मिलीभगत का नतीजा है कि औषधि विभाग अदालतों में आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत पेश नहीं कर पा रहा है और इस गिरोह के मास्टरमाइंड जेल से बाहर आ रहे हैं।
सबसे बड़ी रेड का सच: 72 करोड़ का छापा, 27 सैंपल पास
इस पूरे खेल को समझने के लिए बीते दो वर्षों की सबसे बड़ी कार्रवाई का उदाहरण ही काफी है:
- छापेमारी की तारीख: 22 अगस्त 2025
- कार्रवाई: फव्वारा थोक दवा बाजार में औषधि विभाग और एसटीएफ का संयुक्त छापा।
- बरामदगी: 72 करोड़ रुपये मूल्य की दवाएं जब्त, 5 मुख्य फर्म और गोदाम सील।
- नेटवर्क: आगरा से पुडुचेरी तक तार जुड़े मिले।
कंपनियों ने कहा था ‘नकली’, लैब ने दी ‘क्लीन चिट’
कार्रवाई के दौरान नामी फार्मास्युटिकल कंपनियों के प्रतिनिधियों को मौके पर बुलाया गया था। पैकिंग, फॉन्ट, होलोग्राम और बैच नंबर देखकर कंपनियों ने दवाओं को प्रथम दृष्टया नकली घोषित किया था।
जांच के लिए कुल 28 नमूने (Samples) केंद्रीय प्रयोगशाला भेजे गए। लेकिन जब नवंबर में रिपोर्ट आई, तो हर कोई हैरान रह गया:
- 28 में से 27 नमूने जांच में पास हो गए।
- केवल निमोनिया की एक दवा अधोमानक (Substandard) पाई गई।
- परिणामस्वरूप, फर्जीवाड़े के इस बड़े मामले को एक तरह से ‘क्लीन चिट’ मिल गई और जेल भेजे गए 5 से अधिक मुख्य आरोपी जमानत पर रिहा हो गए।
कैसे होता है नकली दवाओं की ‘पैकिंग’ और QR कोड का खेल?
जांच में सिंडिकेट के काम करने का एक बेहद शातिर तरीका सामने आया था:
- असली बैच और QR कोड का इस्तेमाल: यह नेटवर्क पहले बाजार से असली दवा खरीदता था।
- मास्टर क्लोनिंग: उसी असली बैच नंबर और QR कोड का इस्तेमाल करके 100 से 1000 तक नकली डिब्बे तैयार कर दिए जाते थे।
- ग्राहकों को धोखा: जब कोई ग्राहक QR कोड स्कैन करता, तो स्क्रीन पर असली कंपनी का ब्योरा खुलता था।
- अंतर कहां पकड़ा गया: असली कंपनियां हर डिब्बे (Box) पर अलग यूनिक QR कोड दर्ज करती हैं, जबकि इस गिरोह द्वारा जब्त किए गए सभी बॉक्स पर एक ही QR कोड प्रिंट था।
कंपनी प्रतिनिधियों ने इसी आधार पर दवाओं को तुरंत फर्जी बताया था, लेकिन लैब की केमिकल जांच में एक्टिव ड्रग कंपोजीशन सही मिलने के कारण रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई।
9 मुकदमों में 40 आरोपी, फिर भी नतीजा ‘सिफर’?
जून 2025 से अब तक औषधि विभाग और एसटीएफ मिलकर कुल 9 मुकदमे दर्ज करा चुके हैं, जिनमें 40 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया गया और एक दर्जन से अधिक को जेल भेजा गया।
- हालिया कार्रवाई (जून 2026): 22 से 24 जून 2026 के दौरान 38 मेडिकल फर्मों पर छापे मारकर 3.80 करोड़ की दवाएं जब्त की गईं। इसके अलावा 12-14 जून के बीच 80 लाख रुपये की एंटीबायोटिक, डायबिटीज और अन्य दवाएं सीज की गईं।
- नए सैंपल की स्थिति: इस दौरान कुल 90 नए नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं, जिनकी रिपोर्ट आना अभी बाकी है।
उठते गंभीर सवाल: नमूने बदलते हैं या रिपोर्ट का दायरा सीमित है?
28 में से 27 नमूनों का पास होना दवा बाजार में चर्चा और संदेह का विषय बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने कई यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं:
- नमूनों में हेरफेर? क्या सैंपल स्थानीय स्तर पर बदले जाते हैं या प्रयोगशाला के स्तर पर कोई खेल होता है?
- जांच का मापदंड: क्या लैब में सिर्फ दवा के अंदर मौजूद केमिकल कंपोजीशन (Salt) को देखा जाता है, जबकि बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), फर्जी पैकिंग और अवैध क्यूआर कोड जैसे धोखाधड़ी के पहलुओं को दरकिनार कर दिया जाता है?
- सप्लाई चेन का ढोंग: पुडुचेरी की बंद कंपनियों के नाम पर बिलिंग और यूपी में अनधिकृत डिलीवरी मिलने के बावजूद केवल केमिकल रिपोर्ट के आधार पर केस क्यों कमजोर हो जाता है?
जब तक औषधि विभाग और जांच एजेंसियां कानूनी खामियों और लैब जांच के दायरे को दुरुस्त नहीं करतीं, तब तक करोड़ों की छापेमारी केवल कागजी आंकड़े बनकर रह जाएगी और नकली दवाओं का यह सिंडिकेट कानून के शिकंजे से बचता रहेगा।




