जौनपुर। रविवार 14 सितंबर को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका का पर्व माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुख.समृद्धि के लिए बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया गया है।

इस पर्व से जुड़ी मुख्य बातें और महत्व


इस व्रत को मातृशक्ति की अटूट आस्था और त्याग का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि यह व्रत संतान पर आने वाले संकटों को टाल देता है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
क्या है व्रत के नियम
व्रत की शुरुआत शनिवार 13 सितंबर को नहाय. खाय की परंपरा के साथ हुई। जिसमें महिलाएं स्नान कर पवित्र भोजन करती हैं। निर्जला व्रत 14 सितंबर को होने वाला है जिसमें माताएं सूर्योदय से लेकर अगले दिन के पारण तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए कठोर निर्जला उपवास रखती हैं।
पारण व्रत का पारण सोमवार
पारण व्रत का पारण सोमवार 15 सितंबर को किया जाएगा। इसमें सुबह स्नान के बाद भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। शाम को जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा की जाती है जिसके लिए कुश, गाय का गोबर और अन्य सामग्री का उपयोग किया जाता है। पूजा में चील और सियारिन की कथा सुनना और व्रत के पारण के लिए प्रसाद तैयार करना शामिल है।
क्या है जितिया से जुड़ी कथाएँ
इस व्रत से दो प्रमुख पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं। राजा जीमूतवाहन की कथा है। इस कथा में एक गरुड़ को बचाने के लिए राजा जीमूतवाहन द्वारा अपना शरीर अर्पित करने का वर्णन है। उनकी त्याग भावना के कारण ही यह व्रत जीवित्पुत्रिका कहलाता है। चील और सियारिन की कथा व्रत के नियमों का पालन करने और न करने के परिणाम को बताती है। जिसमें निष्ठा से व्रत करने वाली चील को सुखी संतान का आशीर्वाद मिलता है जबकि व्रत तोड़ने वाली सियारिन को दुख उठाना पड़ता है।
जलाशयों पर पूजा का विवरण
हिंदू संस्कृति में पवित्र जल और नदियों के महत्व पर आधारित है, जहाँ इन्हें जीवन का आधार माना जाता है और देवी. देवताओं के रूप में पूजा जाता है। इसमें नदी पूजन, कुआँ पूजन, छठ पूजा और गंगा स्नान जैसे पारंपरिक अनुष्ठान शामिल हैं।
तहसीलों में जलाशयों पूजा
तहसीलों में जैसे मछलीशहर, शाहगंज, केराकत, जफराबाद समेत अन्य जगहों पर जलाशयों की पूजा पारंपरिक और क्षेत्रीय रीति.रिवाजों के अनुसार हुई है। जिसमें आमतौर पर जल, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य फल.मिठाई जैसी सामग्री अर्पित की जाती है साथ ही मंत्रोच्चार भी शामिल हैं। पूजन विधि में देवी.देवताओं का आवाहन यानी उनकों बुलाना, आसन प्रदान करना, उनके चरणों को धोना और उन्हें स्नान कराना शामिल है। जैसा कि षोडशोपचार पूजा में होता है। पूजा का उद्देश्य जल की देवी.देवताओं से जल स्रोत की रक्षा और समृद्धि के लिए प्रार्थना करना होता है।
नगरों में जलाशयों पूजा
नगरों में महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में सजकर कलश सिर पर रखकर ढोल. नगाड़ों के साथ तालाब तक गई हैं, उसकी परिक्रमा भी की हैं और मन्नतें मांगी हैं। इस अवसर पर कई बार बहनें तालाब में उतरकर भाइयों की सुख.समृद्धि की कामनाएं की हैं और भाईयों ने उन्हें उपहार देकर चुनरी ओढ़ाया हैं। यह पूजा स्थानीय परंपराओं का हिस्सा है जो सामाजिक एकता और सामुदायिक जुड़ाव को दर्शाती है और यह जल स्रोतों की शुचिता और संरक्षण के महत्व को भी रेखांकित करती है।
Author: fastblitz24



